फीस में सिर्फ मुस्कुराहट

February 9, 2010 by myindiamycause


वेलेन्टाइन डे का बेसब्री से इंतजार कर रहे युवाओं के लिए जबलपुर के डॉ. जगत सिंह आहूजा और उनकी पत्नी आशा देवी की जोड़ी मिसाल है। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके दोनों का प्यार परोपकारी के राह पर मजबूत डोर में बंधा है। दोनों ही बिना किसी स्वार्थ के पीडि़त मानवता की सेवा में जुटे हुए हैं।

कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो उम्र आड़े नहीं आती। उम्र के 71 वसंत पार कर चुके डॉ. जगत सिंह आहूजा मरीजों के घर-घर जाकर उनका नि:शुल्क उपचार करते हैं। लोग उन्हें चलता-फिरता दवाखाना मानने लगे हैं। पीडि़त मानवता की सेवा को जीवन का लक्ष्य मान चुके डॉ. आहूजा एम.पी.एस.ई.बी में सहायक इंजीनियर रहे हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद पिछले दस साल से वह पीडि़तों का उपचार कर रहे हैं। लोग विश्वास से इलाज करा सकें, इसलिए वह अपने आयुर्वेद चिकित्सा, विटामिन थैरेपी, शिक्षा संबंधी प्रमाण पत्र साथ लेकर भी चलते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं सेवा भावना से कार्य कर रहा हूं। मेरा मरीज ठीक होकर मुस्कुरा दे, यही मेरी फीस है..।Ó परोपकारी के इस काम में उनकी पत्नी आशा देवी सहभागी रहती हैं।

साइकिल से सफर
इस उम्र में भी डॉ. आहूजा साइकिल चलाते हैं। वह सुबह दस बजे घर से साइकिल पर निकलते हैं। शहर में अलग-अलग स्थानों पर जाकर रोगियों को उपचार मुहैया कराते हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन करीब 100 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। दमा, डायबिटीज, अस्थमा, पीलिया, वातरोग आदि की दवा देते हैं। वह तब तक मरीज के घर जाते रहते हैं, जब तक वह पूर्णत: स्वस्थ नहीं हो जाए।
एक वक्त भोजन
डॉ. आहूजा केवल एक वक्त भोजन करते हैं। उनके पास चिकित्सा शिक्षा से संबंधित सैकड़ों पुस्तकें हैं। सभी निरोगी रहें, यही उनकी कामना है। डॉ. आहूजा का मानना है कि तैराकी और साइकिलिंग सबसे अच्छा योग है। साइकिलिंग से बॉडी फिट रहती है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए भी साइकल बेहतर है। उन्होंनेे साइकिल के अलावा दूसरा कोई वाहन नहीं चलाया। उनकी तमन्ना साइकिल से भारत भ्रमण करने की है।

वांगचुक से सीखें, कैसी हो शिक्षा

February 7, 2010 by myindiamycause


लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है। यह सब कमाल किया लद्दाखी इडियट सोनम वांगचुक ने।

लेह से थोड़ी दूरी पर फे गांव में गैर-सरकारी संगठन सेकमॉल की इमारत है। यह कोई सामान्य इमारत नहीं है, बल्कि लद्दाख में शिक्षा के दिखाई दिए नए चेहरे की रचयिता है। यहीं से सोनम वांगचुक लद्दाख में शिक्षा को जनोन्मुखी बनाने की अपनी मुहिम चला रहे हैं। यह मुहिम आज सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक आईना बन चुकी है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद हम अपनी शिक्षा पद्धति को जनता की जरूरत के अनुरूप नहीं बना पाए हैं। वांगचुक ने लद्दाख में मैकाले आधारित शिक्षा में बदलाव के लिए लम्बा संघर्ष किया और इसमें वह रोशनी का नायक बनकर उभरा।

वांगचुक के कामकाज को देखकर सहसा आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्सÓ के किरदार फुनसुक वांगडुग की याद आने लगती है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद शिक्षा को नया आयाम देने लद्दाख पहुंचता है। ऐसा एहसास होता है कि आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ के वांगडुग का किरदार सोनम वांगचुक की जिंदगी पर रचा गया। वांगचुक को आप और हम असली जिंदगी में ..लद्दाखी इडियट.. का नाम दे सकते हैं। लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है।

वांगचुक ने दुनिया की इस खूबसूरत वादियों में शिक्षा में बदलाव लाने की नींव 1988 में रखी। तब वह सिविल इंजीनियर बनकर लद्दाख लौटे थे। उस समय स्कूल की पढ़ाई आसान नहीं थी। आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम उर्दू था और उसके बाद नौंवी और दसवीं में पूरी शिक्षा अंग्रेजी में होती थी। वांगचुक खुद भी फेल हो गए। बाद में वह इंजीनियर बनने के लिए चले गए। जब वापस लौटे तो उन्हें वहां की शिक्षा के ढर्रे में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया।

बकौल वांगचुक, अगर असफलता का प्रतिशत 95 था तो इसका मतलब है कि पूरी प्रणाली में ही कुछ खामी है। हालांकि दिक्कतें इससे भी अधिक गहरी थी। सबसे बड़ी समस्या थी भाषा, प्रशिक्षित शिक्षक और ऐसे पाठ्यक्रम की, जो 11,000 फीट की ऊंचाई पर रहने वाले छात्रों का भविष्य संवार सके। केवल पांच फीसदी बच्चे ही दसवीं उत्तीर्ण कर पाते थे। बेहद चिन्ताजनक हालात थे। इसलिए वहां जरूरत थी बदलाव की, क्योंकि शिक्षा का मतलब पढऩा, लिखना और याद करना नहीं है। लद्दाखी शिक्षा का अर्थ है तेज दिमाग, कुशल हाथ और कोमल हृदय वाले होनहार छात्र।

वांगचुक ने लद्दाखी भाषा और संस्कृति के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने, स्कूल चलाने और प्रशिक्षित शिक्षक तैयार करने के लिए वहां के समुदाय को संगठित किया। शिक्षा में बदलाव के लिए त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई। इसके तहत गांवों में शिक्षा समितियां बनार्ई गई, शिक्षक प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराई गई और भाषा एवं संस्कृति ज्ञान पर ध्यान दिया। अभियान का बीडा ससपोल गांव के एक स्कूल से शुरू हुआ, जो श्रीनगर मार्ग पर पड़ता है। मेहनत रंग लाई और वहां की सरकार ने 1992 में प्राइमरी स्तर पर अंग्रेजी को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया। यह राय बनी कि अंग्रेजी की जानकारी के बगैर लद्दाखियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिल सकती। इससे लद्दाख के स्कूलों में सुधार का शैक्षिक मॉडल विकसित हो गया।

वांगचुक ने अपना अभियान सुचारू चलाने के लिए ‘एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (सेकमॉल) बनाई। इसके तहत 1994 में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन न्यू होप’ से लद्दाख के शिक्षा मॉडल में परिवर्तन की बयार बहने लगी। यह ऐसा अभियान था, जिसमें वांगचुक और उनकी साथियों ने सरकार और पूरे समुदाय का दिल जीता। वर्ष 1996 में हिल काउन्सिल ने वांगचुक के सहभागिता मॉडल को स्वीकार कर लिया। उन्होंने शिक्षकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और पाठ्यक्रम को बदल दिया। किताबों में शिक्षाप्रद बातों के अलावा लद्दाखी रीति-रिवाजों और पर्यावरण को लेकर जानकारी दी जाने लगी थी। इस कड़ी मेहनत का नतीजा कुछ दिनों में सामने आने लगा और 2002 में उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या पांच से बढ़कर 50 फीसदी हो गई।

फे में सेकमॉल का आवासीय परिसर शिक्षा में बदलाव की बेहतरीन मिसाल है। इसमें छात्रों के सम्पूर्ण विकास की दृष्टि से गतिविधियां चलती हैं। पढ़ाई का तरीका स्कूल पाठ्यक्रम से हटकर है। छात्रों को लद्दाखी संस्कृति और विरासत का ज्ञान कराने के साथ ही जीवन कौशल की सीख दी जाती है। यहां वरिष्ठ छात्र मामूली फीस देकर रह सकते हैं। शिक्षक बनने की चाहत रखने वाले लोगों को आर्थिक मदद दी जाती है। यह परिसर पूर्णतय: सौर ऊर्जा पर आधारित है। 16-24 पेनल के चार ऐरो बिजली उत्पादित करते हैं। इनसे कम्प्यूटर और टीवी चलते हैं। सामुदायिक रसोई में दो सोलर कूकर हैं। इनके लिए पेसिव सोलर डिजाइन का इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा कम कीमत का वाटर हीटर लगाया हुआ है। सेकमॉल की ओर से डिजाइन किए गए सौ लीटर के एक सोलर हीटर की कीमत 3500 रुपए है, जबकि इसी क्षमता का वाणिज्यिक हीटर 25000 रुपए में आता है।

वर्ष 2000 में वांगचुक ने खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘शेसन सोलर अर्थवक्र्सÓ बनाई। यह प्राइवेट, सरकारी, एनजीओ और सेना के लिए सोलर बिल्डिंग का निर्माण करती है। इसकी कमाई शैक्षिक सुधार और पर्यावरण जागरूकता पर खर्च होती है। शुरूआती दौर में वांगचुक के अभियान का खर्च संस्थापक सदस्यों के सहयोग से चलता था, लेकिन अब वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका आधा खर्च सेकमॉल प्रकाशन कीकिताबों की बिक्री, शैक्षिक सहायता, ईको-टूरिज्म और सोलन बिल्डिंग निर्माण से निकलता है।

पौधा रोपकर जन्मदिन का उत्सव

February 6, 2010 by myindiamycause


सुबह के ठीक 10 बजे… जबलपुर में जन्मदिन का अनोखा उत्सव। इस मौके पर न तो केक काटा जाता है, ना ही पार्टी दी जाती है। लोग पौधा रोपकर जन्मदिन मनाते हैं। यह उत्सव एक… दो… तीन… नहीं, लगातार 2011 दिन (छह साल) से चल रहा है। कदम संस्था के योगेश गनोरे ने इस क्रम को उस वक्त भी रुकने नहीं दिया, जब उनका एकमात्र बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। कारवां चलता गया और लोग जुड़ते गए। अब यह अभियान जबलपुर से बाहर निकलकर गाडरवारा, दमोह, टीकमगढ़, कटनी, भोपाल और बड़वानी तक पहुंच गया है। कदम संस्था के सदस्य कनाडा, डेट्रायट अमेरिका और रूस में भी पौधा लगाकर अपना जन्मदिन मना रहे हैं। उनकी हसरत इस अभियान को पूरी दुनिया में पहुंचाने की है।

पौधा रोपकर जन्मदिन मनाने को प्रथा बनाने के मकसद से यह अभियान 17 जुलाई, 2004 से जबलपुर में शुरू किया गया। शुरुआती दौर में लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि यह काम निरंतर चलता रहेगा। पहले हफ्ते, फिर महीने, उसके बाद साल और अब छठवें साल में प्रवेश कर चुके इस अभियान में कई जानी-मानी हस्तियां भी पौधारोपण कर जन्मदिन मना चुकी हैं। इनमें गायत्री परिवार के मुखिया डॉ. प्रणव पंडया, समाजसेविका मेधा पाटकर, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी, पूर्व महापौर विश्वनाथ दुबे शामिल हैं। अभी तक सैकड़ों लोग पौधा रोपकर अपनी सालगिरह मना चुके हैं। इस अभियान को समय प्रबंधन की भी मिसाल माना जाता है। सुबह 10 बजे शुरू होने वाला अभियान 10:15 बजे समाप्त हो जाता है।

योगेश गनोरे के मन में जन्मदिन पर पौधा लगाने की कल्पना 25 वर्ष पहले आई। इस कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने अपने परिचितों और मित्रों को जन्मदिन पर पौधा लगाने के लिए पोस्टकार्ड लिखना शुरू किया। उनका जन्मदिन 17 मई को आता है। गर्मी में पौधा लगाना और उसे बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती थी। उन्हें जब इस काम में सफलता मिलने लगी तो उनके मन में ख्याल आया कि यह रोज क्यों नहीं हो सकता। जबलपुर के तत्कालीन महापौर विश्वनाथ दुबे को यह ख्याल इतना पसंद आया कि वह पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड देने के लिए राजी हो गए। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा।

दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ कि किसी पौधे की सुरक्षा गोल्डन ट्री के जरिए की जा रही हो। कदम संस्था के अभियान का 1000वां पौधा 12 अप्रेल, 2006 को जबलपुर के भंवरताल गार्डन में रोपा गया, जिसकी सुरक्षा के लिए गोल्डन ट्री लगाया गया।
योगेश गनोरे का सपना दुनिया को युद्ध से मुक्त करने का है। इस सपने को पूरा करने के लिए वह इजरायल और फिलीस्तीन के बीच गाजापट्टी पर प्लांट फॉर पीस लगाना चाहते हैं। इस अभियान में दुनियाभर के राजनायकों को बुलाने की योजना है। उनका कहना है कि जिस दिन वह इसमें कामयाब होंगे, उनकी जिंदगी का वह सबसे खुशनुमा लम्हा होगा।

पर्यावरण प्रेम में रंगे रंगा

February 6, 2010 by myindiamycause


राजस्थान के फलौदी जिले में जन्मे नरसिंह रंगा भले अल्प शिक्षित हों, लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी सोच और काम देखकर बड़े-बड़े पर्यावरणविद् अचंभित हो जाते हैं। आठवीं कक्षा पास करने के बाद रंगा मामा के साथ टिम्बर के व्यवसाय से जुड़ गए। लकड़ी की कटाई के लिए मध्यप्रदेश के जंगलों में घूमते रंगा के मन में एक दिन यह विचार आया कि हर आदमी जंगल काटने पर आमादा है। आखिर जंगल लगाने वाले भी तो होने चाहिए। जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर नर्मदा किनारे बसे ग्राम बासनियाकलां के पास उनकी थोड़ी जमीन थी। उन्होंने देखा कि हर साल नर्मदा की बाढ़ में उनकी जमीन कटती जा रही है। वह परेशान हो उठे। उन्होंने इस जमीन को बचाने की ठान ली।

सन् 1992 से उन्होंने नर्मदा के किनारे की जमीन पर बांस के पौधे रोपे। पौधे रोपने का नशा ऐसा चढ़ा कि वह नर्मदा किनारे जमीन खरीदते गए और पौधे रोपते गए। करीब दस साल में उन्होंने एक हजार एकड़ जमीन खरीदकर उस पर जंगल खड़ा कर दिया। इस समय इस जमीन पर लाखों की तादाद में बांस, खमेर, नीलगिरी के पेड़ खड़े हैं। यह सब उन्होंने बिना किसी शासकीय या गैर शासकीय मदद के किया है। जंगल से जमीन पर कटाव तो रुका ही, अब यह जंगल उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी बन गया है। वह इससे हर साल लाखों रुपए कमाते हैं। उनके जंगल को देखने प्रदेश और देश के कई पर्यावरणविद् और जंगल महकमे के अधिकारी आ चुके हैं। कई विदेशी पर्यावरणप्रेमी भी रंगा प्लांटेशन का भ्रमणकर उसकी तारीफ कर चुके हैं।

रंगा कहते हैं कि नर्मदा को बचाना है तो उनके दोनों किनारों पर सघन हरित पट्टी विकसित करनी होगी। इससे नर्मदा भी बचेगी और कटाव भी रुकेगा। खेती को यदि लाभ का धंधा बनाना है तो इससे बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है। रंगा ने जंगल की देखरेख रोकने अनोखा तरीका अपनाया है। नजदीकी ग्रामीणों को सब्जी और फसल उगाने के लिए वह जमीन फ्री उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण जंगल की देखरेख करते हैं और चोरी जैसी घटनाएं नहीं होतीं।

न डरूंगा न किसी को डरने दूंगा

February 4, 2010 by myindiamycause


एचआईवी पॉजीटिव राजपालसिंह शेखावत जगाते हैं बीमारी से लडऩे का जज्बा
अगर डर गया होता तो शायद जिंदा नहीं बचता और ना ही उन लोगों को हौसला दे पाता, जो मेरी तरह हैं। मेरा भरोसा देख कई लोगों में बीमारी से लडऩे की ताकत पैदा हो जाती है। भगवान ने मुझे न जाने कहां से यह हिम्मत दे डाली कि एचआईवी पॉजीटिव होने का पता चलने के बावजूद चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। खुद जीने की चाह और यही चाहत औरो में पैदा करने का संकल्प लिए एड्स पीडि़तों के लिए काम कर रहा हूं। हिम्मत भरे यह अल्फाज हैं 42 साल के राजपालसिंह शेखावत के। वह पिछले सात साल से मध्यप्रदेश के झाबुआ में रह रहे हैं। दो साल पहले उन्हें पता चला कि शरीर को ऐसी बीमारी लग गई, जिसका इलाज साइंसदान अब तक ढूंढ नहीं सके हैं।

वह साथी हैं जीवन ज्योति संस्था मेघनगर के परियोजना प्रबंधक जिमी निर्मल के। जिमी और वह मिलकर झाबुआ और आलीराजपुर में पॉजीटिव मरीजों की तलाश करते हैं, उन्हें एड्स के बारे में पूरी तरह से समझाइश देते हैं और इससे नहीं डरने की सलाह भी। उनके साथी जिमी बताते हैं कि बीते कई साल से इस फील्ड में काम कर रहा हूं, लेकिन राजपालजी के साथ होने से काम को गति मिली। जब कोई पीडि़त व्यक्ति खुद बीमारों तक जाकर उन्हें समझाता है तो उसका असर कुछ ज्यादा होता है।

शेखावत कहते हैं कि आगे जो होना है सो होकर रहेगा, लेकिन आज को जीने की चाहत ही सबसे बड़ी ताकत है। मुझमे वो ताकत है, जो अपने साथियों में बांटने की कोशिश करता हूं। जब मुझे पता चला कि एचआईवी पॉजीटिव हूं, तब जीने की सारी उम्मीद खत्म हो गई। एक महीने तक निराशा से जूझता रहा। जीवन ज्योति मेघनगर के लोगों ने मुझे समझाया की डरने की जरूरत नहीं है। उनकी बातों से कुछ करने को बल मिला और मैंने वॉलंटरी वर्क शुरू कर दिया। आठ महीने तक जीवन ज्योति हेल्थ सर्विस सोसायटी के साथ इस क्षेत्र में काम किया। फिर फील्ड में काम करने लगा। अब गांव-गांव जाकर मरीज ढूंढते हैं और उन्हें समझाते हैं।

जुलाई 2008 में एक नेटवर्क बनाया, ‘झाबुआ नेटवर्क ऑफ पीपल लीविंग विथ एचआईवी एड्सÓ। आज इस नेटवर्क में 120 पॉजीटिव सदस्य हैं। एक पूरा परिवार बन चुका है, जो हर महीने एक से दो बार मिलता है और अपने दु:ख-दर्द आपस में बांटता है। अब राजपालसिंह और भी पॉजीटिव मरीजों को इस मुहिम से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं। मरीजों को आयवद्र्धक कार्यक्रमों से जोडऩे के लिए प्लान तैयार कर रहे हैं।

वह खुद को सामान्य व्यक्ति की तरह मानते हैं और ऐसा ही व्यवहार करते हैं। हालांकि कभी-कभार कुछ घटनाएं दिल दुखाने वाली भी सामने आती हैं। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि इंदौर में एक पुलिस वाले ने मोटर साइकिल पर लिफ्ट मांगी। वह सब इंस्पेक्टर था। रास्ते में बातचीत हुई तो उसने सवाल किया, क्या करते हो। मंने जवाब दिया एड्स पीडि़त हूं और पीडि़तों के लिए काम करता हूं। इतना सुनना था कि उसने गाड़ी रुकवाई और कुछ काम का बहाना कर वहां से भाग गया।

राजपालसिंह कहते हैं कि बीमारी को लेकर आम लोगों में जागरुकता की कमी है। यही कारण है कि पीडि़तों को अलग-थलग कर दिया जाता है। शहर और गांव सभी जगह यही हाल हैं। सरकारी अस्पतालों में भी पीडि़तों की केयर नहीं होती। सुविधाओं का अभाव बताकर उन्हें इंदौर जाने के लिए कह दिया जाता है। कुछ भी हो ,आखिरी सांस तक मैं यही कोशिश करूंगा कि लोग समझें और ऐसे लोगों को सामान्य जीवन जीने दें। न तो खुद डरूंगा और न ही अपने साथियों को डरने दूंगा।

उनके खजाने में हैं टकसाल की गलतियां

February 4, 2010 by myindiamycause


मिस प्रिंट नोटों से लेकर गलत ढले सिक्कों का कलेक्शन, गलत मुद्रा को चलन से बाहर करने की कोशिश
मध्यप्रदेश में उज्जैन के बृजमोहन खंडेलवाल के खजाने में जमा नोट और सिक्के अपनी मूल कीमत से कई गुना ज्यादा कीमती हैं। हकीकत में टकसाल की गलतियों के कारण बाजार में आ गई त्रुटिपूर्ण मुद्राओं को सहेजकर उन्होंने अपना खजाना तैयार किया है। उनके पास नोट प्रेस से बगैर नम्बर छपे चलन में आए नोटों के अलावा एक ही नम्बर तीन जगह मुद्रित होने वाले नोट भी हैं।

पेशे से दवा विक्रेता खंडेलवाल को करीब 10 साल पहले उनके हाथ में आए एक रुपए के मिसप्रिंट नोट ने ऐसे नोटों और सिक्कों को एकत्रित करने की प्रेरणा मिली। रफ्ता-रफ्ता उनका खजाना बढ़ता गया और कई लोगों की मदद से उन्हें आसानी से मिसप्रिंट नोट उनके संग्रह के लिए मिलने लगे। खंडेलवाल के मुताबिक कई बार ज्यादा कीमत चुकाकर तो कई बार एक्सचेंज आफर में लोगों से ऐसे नोट हासिल किए। हालांकि अधिकांश मिसप्रिंट नोट उन लोगों की मदद का नतीजा है, जिन्हें खंडेलवाल के इस शौक के बारे में जानकारी लगती थी। इनमें अधिकांश पान वाले और डेली कलेक्शन करने वाले साथियों का सहयोग ज्यादा रहा।

अपने पहले नोट के बारे में बताते हुए युवा दवा व्यापारी बृजमोहन कहते हैं कि उस एक के नोट पर महीनों के नाम देखकर हैरान रह गया, लेकिन फिर मन में आया कि ऐसे कई नोट होंगे जो नोट प्रेस की कड़ी चैकिंग से बचकर बाजार में आ गए हैं। बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है, इसलिए अर्थशा के इस गूढ़ वाक्य को ध्यान में रखकर गलत मुद्राओं को चलन से दूर रखने की कोशिश करता हूं।

खंडेलवाल के मुताबिक उनके पास नोट ही नहीं, टकसाल में गलत ढल गए सिक्के भी हैं। इनमें कटे सिक्कों के अलावा एक तरफ से बगैर आकृति छपे सिक्के शामिल हैं। इतना ही नहीं, संपत्ति की रजिस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले स्टॉम्प पेपर भी कुछ साल से उनके संग्रह में शामिल हो गए हैं।

कृष्ण ने भेदी थी मछली की आंख
भले ही भागवत कथा के मुताबिक द्रोपदी को ब्याहने के लिए अर्जुन ने पानी में अक्स देखकर मछली की आंख का निशाना साधा हो, लेकिन खंडेलवाल के संग्रह में डाक विभाग द्वारा जारी एक ऐसा टिकट भी है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को मछली की आंख का निशाना लगाते दिखाया गया है।

अच्छाई भी शामिल
ऐसा नहीं कि बृजमोहन खंडेलवाल के संग्रह में केवल गलतियों वाले सिक्के और नोट ही शामिल हों। उनके पास कई ऐसे सिक्के भी हैं जो भारत सरकार ने वक्त-वक्त पर विशेष मौकों पर निकाले हैं। इनमें आजादी की स्वर्ण जयंती पर जारी किए गए 100 रुपए के सिक्के के अलावा जार्ज पंचम के जमाने के सिक्के शामिल हैं।

लिम्का बुक में दर्ज है नाम
अपने इस अनूठे संग्रह के कारण खंडेलवाल के नाम रिकार्ड भी दर्ज है। 2002-03 में उनका नाम लिम्का बुक आफ रिकाड्र्स में शामिल किया जा चुका है। कुछ साल से गलत प्रिंट वाले नोट मिलना कम हो गए हैं। इसका कारण अब नोटों की गिनती मशीनों से होना है। पहले हाथों से नोटों की गिनती होती थी तो ऐसे नोट नजर में चढ़ ही जाते थे, लेकिन अब ऐसा कम हो गया है।

मिल गया साहिल मुझे

February 3, 2010 by myindiamycause


रेवती का ‘साहिल’ ऐसे बुजुर्गों का सहारा हैं, जिन्हें अपनों ने गम देकर घर से बाहर निकाल दिया।

कदम-कदम पर ऐसे मोड़ आते हैं जो जिंदगी की परिभाषा और मायने ही बदल देते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ रेवती शर्मा के साथ। हंसती-खेलती जीवन में वज्रपात हुआ। पति असमय ही काल के गाल में समा गए। कुछ बुजुर्र्गों के साथ नाइंसाफी होती देखी तो उन्हें सहारा देने के लिए वृद्धाश्रम ‘साहिल’ खोल लिया। यही रेवती का परिवार है। रेवती के लिए साहिल वृद्धाश्रम तक का सफर कोई आसान नहीं रहा। जयपुर में पली-बढ़ी और 1991 में शादी हो गई। कहती हैं, ‘पति जितेंद्र शर्मा जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में साइंटिस्ट थे। महज सात साल बाद ही हार्ट अटैक ने उन्हें छीन लिया। गम से उबरना मुश्किल था।

पति हमेशा रिटायरमेंट के बाद अजमेर में सैटल होने की बात कहते थे। इसलिए बेटे के साथ अजमेर चली आर्ईं।Ó वह बताती हैं, ‘अजमेर में रहते तीन साल पहले एक एक्सीडेंट ने कई दिन जेएलएन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। अपना न कोई देखरेख करने वाला था…न पूछने वाला। इसी बीच बगल के पलंग पर भर्ती वृद्ध महिला से मुलाकात हुई। समृद्ध परिवार से थी लेकिन कोई देखरेख करने वाला नहीं था। वृद्धा मानो कुछ संदेश लेकर आई थी। यहीं मुझे मेरा ‘साहिलÓ यानी किनारा और मेरी मंजिल मिल गई।

जीवन के किनारे पर खड़े बुजुर्र्गों की सेवा-सुश्रुषा मेरी जिंदगी का मकसद बन गया।Ó बड़ी बेकाकी से वह स्वीकार करती हैं, ‘बचपन में मैं दादा-दादी के ज्यादा करीब रहीं। मां का उनके प्रति व्यवहार को लेकर कभी-कभी खिन्नता होती थी।Ó बेटे का नाम पुष्पेंद्र है लकिन उसे भी वह साहिल कहकर पुकारती हैं।

अस्पताल से बाहर निकलते ही रेवती ने दो साल पहले किराए के मकान में साहिल वृद्धाश्रम की शुरुआत की। सबसे बड़ी समस्या धन की थी। रेवती कहती हैं ‘शहर में ऐसे आठ-दस लोग हैं जो मध्यमवर्ग से हैं लेकिन उनमें सेवाभाव का जज्बा है। ये लोग अपनी गृहस्थी के खर्र्चों से कटौती कर कुछ न कुछ वृद्धाश्रम को दान देते रहते हैं।Ó रेवती का परिवार धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। आज साहिल में 13 सदस्य हैं। इनमें ज्यादातर तो ऐसे परिवारों से हैं जहां किसी बात की कमी नहीं है। फिर भी उन्हें ठुकरा दिया। वह बताती हैं, शहर में ही कई ऐसे वृद्ध हैं जो परिवार की कलह से तंग आकर यहां आना चाहते हैं। जिसे कहीं ठोर नहीं मिल रही उसके लिए उनके साहिल के दर खुले हैं।

तालीम से काटो अंधेरा

February 3, 2010 by myindiamycause


बालिका-महिला शिक्षा के लिए प्रेरणा पुंज है शगुफ्ता
राजस्थान में ख्वाजा की नगरी अजमेर में अरावली पहाड़ी की तलहटी में बसी मुस्लिम बस्ती में अरसे से अशिक्षा का अंधेरा था। जहां महिलाओं का काम था घर और बच्चे संभालना। बालिकाओं को स्कूल भेजने की जरूरत ही नहीं समझी जाती थी। शोषण, घरेलू हिंसा की जड़ें उस अंधेरे में कहां तक पहुंच गई…किसी ने सोचा भी नहीं। करीब तीस साल पहले उस अंधेरे के बीच एक किरण फूटी, जो आज घनी आबादी में तालीम की रोशनी बांट रही है। उसका मानना है ‘तालीम ही वह शमशीर है जो जिंदगी की हर मुसीबत को काट सकती है।

हजारों लोगों की इस बस्ती में करीब-करीब हर महिला-बालिका उस किरण को शगुफ्ता मैडम के नाम से जानती हैं। शगुफ्ता खान, जिसका ख्वाब है, ‘हर बालिका पढ़े, हर महिला पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर हो। उनकी सेहत ठीक और भविष्य उज्ज्वल हो। वह मानती हैं, पवित्र कुरान हो या भारतीय संविधान दोनों में महिलाओ को बराबर के अधिकार मिले हुए हैं। जरूरत समझने की है। वह घर-घर जाकर महिलाओं को बताती हैं, ‘महिलाएं कुरान का अनुवाद पढें़, उन्हें खुद अहसास होगा कि वे मर्द से कमतर नहीं हैं।Ó

जाने कितनी फरीदा-सलमा…
नौ साल पहले दक्षिण भारतीय फरीदा की अजमेर में शादी हुई। उसकी माली हालत खराब थी। शगुफ्ता के संपर्क में आकर उसने आठवीं और फिर दसवीं कक्षा पास की। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा सहयोगिनी से लेकर आशा तक का सफर तय किया। आज अपनी जैसी अन्य महिलाओं के लिए आशा का ही काम कर रही है। यही कहानी सलमा की भी है। शगुफ्ता से पे्ररित होकर उसने ओपन स्कूल से दसवीं पास की। आज वह अनुदेशिका के तौर पर काम कर रही है। ऐसी ही जाने कितनी फरीदा और सलमा की जिंदगी में तालीम के सहारे शगुफ्ता ने उजाला किया है। शगुफ्ता खान ने बताया, ‘बचपन खादिम मोहल्ले में बीता। तब मुस्लिम महिलाओं का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं माना जाता था। जब मैं बहनों के साथ स्कूल जाती तो लोग बातें बनाते। कहते बच्चियों को पढ़ाने से क्या होगा? मां ने लोगों की नहीं अपने दिल की सुनी और हमें अच्छी तालीम दिलवाई।

दिन-ब-दिन फैला उजाला
गरीब नवाज महिला एवं बाल कल्याण समिति की सचिव शगुफ्ता खान ने अंदरकोट स्थित अपने घर के ऊपरी कमरे में दफ्तर बनाया। बस्ती से शुरू हुआ उनका सफर जयपुर, जोधपुर, भीलवाड़ा, टोंक तक पहुंच गया। नजदीकी गांव सोमलपुर को इस संस्था ने गोद ले रखा है। अब तक करीब डेढ़ हजार मुस्लिम महिला-बालिकाओं को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना इस संस्था की उपलब्धि है। भजनगंज, बिहारी गंज में बीड़ी मजदूर महिलाओं के उत्थान के लिए भी संस्था सक्रिय है। महिला स्वयं सहायता समूह बनवाकर महिलाओं को पैरों पर खड़ा करना, सरकारी योजनाओं से महिलाओं को लाभान्वित कराना, पल्स पोलियो अभियान से लेकर डॉट्स तक के कार्य में भागीदारी निभाना इस संस्था का कार्य है। शगुफ्ता का संदेश है, हर औरत में रजिया सुल्तान, रानी लक्ष्मी बाई व इंदिरा गांधी जैसी कुव्वत है। बस मुस्लिम महिलाएं अंधेरे से निकलकर उजाले को पहचानें।

न जुताई ना खाद, 40 साल से खेती

February 2, 2010 by myindiamycause

खेतों को जोते बिना, खाद का उपयोग किए बगैर क्या किसी फसल का बंपर उत्पादन संभव है? जी हां, इस असंभव को संभव बनाया होशंगाबाद के प्रयोगशील किसान राजू टाइट्स और उनकी पत्नी शालिनी टाइट्स ने। वे पिछले 40 वर्षों से ऋषि खेती (नेचर फर्मिंग) कर रहे हैं।

होशंगाबाद से

किसी काम को यदि लक्ष्य बनाकर मेहनत और सच्ची लगन से किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। यही कर दिखाया है राजू टाइट्स ने। जापान के कृषि विशेषज्ञ मसेनेबू फुफुओका को अपना आदर्श मानने वाले टाइट्स  40 वर्षों से अपने 93 एकड़ के खेत में ऋषि पद्धति से खेती कर रहे हैं। इस काम में उनकी पत्नी शालिनी बखूबी साथ दे रही हैं। वह संभवत: ऋषि खेती करने वाली जिले की पहली महिला कृषक होंगी।

राजू ने बताया कि ऋषि खेती से न सिर्फ पर्यावरण में संतुलन बना रहता है, बल्कि कम लागत में किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। इस पद्धति से न तो जमीन की जुताई करने की जरूरत है और ना रासायनिक/जैविक खादों की। इतना ही नहीं, गेहूं, धान, मक्का, मैथी, सहित अन्य फसलों को भी एक साथ लगाया जा सकता है। धान के बीजों को मिलाकर गेंदनुमा गोलियां गेहूं के बीच में फेंक दी जाती हैं। गेहूं की पैदावार काटने के साथ ही धान बढऩा शुरु हो जाती है।

नरवाई और पुआल भी फायदेमंद
टाइट्स ने बताया कि धान की कटाई के बाद अधिकतर किसान बची हुई नरवाई और पुआल को महत्वहीन समझकर जला देते हैं और खेतों को बार-बार जोतते हैं। इससे खेत कमजोर हो जाते हैं। पुआल आधारित खेती करने से जुताई की जरूरत नहीं रहती। खाद और दवा की भी जरूरत नहीं होती है। इस पद्धति से खेत स्वयं ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है।

दस साल से बांट रहे हैं ज्ञान का अमृत

February 2, 2010 by myindiamycause

बैतूल से

जिंदगी में काम से रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती। यह बात भले सुनने में अजीब लगे, लेकिन बैतूल जिले के कौसमी गांव में रहने वाले सत्तर बरस के अमृत लाल मालवीय को देखकर हर किसी को शायद यही अहसास होगा। उन्होंने बचपन से ही गुरु बनने का सपना संजोया था, जो पूरा नहीं हो पाया। अमृत लाल ने चालीस साल  सिंचाई विभाग की नौकरी में बिताए।

सन् 2001 में सेवानिवृत्ति के बाद अपना सपना पूरा करने के लिए उन्होंने कोसमी गांव के सरकारी स्कूल को चुना, जहां पिछले एक दशक से बिना पगार के बच्चों को विषयों की पढ़ाई के साथ ही देश-दुनिया की नवीनतम जानकारियां और मदद उपलब्ध कराने में जुटे हैं। देश की आजादी के वक्त आठ बरस के अमृत लाल को पढ़ाई के लिए अपने गांव कोसमी से बैतूल के टिकारी स्कूल तक पांच किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता था।

बचपन से ही शिक्षा की अलख जगाने की तमन्ना रखने वाले अमृत लाल का 1957 में शिक्षक के लिए चयन भी हुआ, लेकिन उम्र कम (17 साल) होने के कारण उनको नौकरी नहीं मिल पाई। लिहाजा उनकी तमन्ना सपना बनकर रह गई। लेकिन सिंचाई विभाग की नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद अमृत लाल ने अपने ख्वाब को हकीकत में तब्दील कर दिया। जून 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद से ही उन्होंने गांव के प्राथमिक स्कूल में बच्चों को निशुल्क पढ़ाना शुरू किया था। सन् 2005 में यहीं पर मिडिल स्कूल खुला तो उन्होंने बड़ी क्लास में गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र पढ़ाना शुरू कर दिया। विषयों की पढ़ाई के साथ-साथ अमृत लाल अपने छात्रों को देश-दुनिया की खेल-राजनीति, विज्ञान, सामान्य ज्ञान से जुड़ी रोचक जानकारियां भी उपलब्ध कराते हैं।

पढ़ाई में कमजोर बच्चों पर खास मेहनत करना और गरीब छात्रों को हर तरह की मदद पहुंचाना उनकी आदत में शुमार है। उनका सिर्फ एक ही मकसद है और वह यह कि शिक्षा का स्तर सुधरे तथा गरीब बच्चों को भी को बेहतर शिक्षा मिले। यही वजह है कि स्कूल में पढऩे वाले छात्र-छात्राएं अमृत लाल का मान-सम्मान करते है। कोसमी गांव के स्कूली बच्चे ओबामा, अटल, सोनिया, सानिया जैसी शख्सियतों के साथ ही दुबई में बनी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, मुम्बई की ताज होटल के बारे बखूबी जानते हैं। इसके पीछे अमृत लाल की मेहनत ही है, जिनकी पढ़ाई का अंदाज काफी निराला है। वह रोजाना अखबार में आने वाली देश-दुनिया की ताजा-तरीन खबरों की कटिंग लाकर बच्चों को उनके बारे में समझाते हैं।

बस्ती कहे मास्साब

अमृत लाल ने भले चालीस साल सिंचाई विभाग में बिताए हैं, लेकिन बस्ती में उनकी पहचान शिक्षक के तौर पर बनी है। लोग उन्हे मास्साब के नाम से पुकारते हैं। गांव के मिडिल स्कूल में 6 से 8 तक तीन कक्षाओं को पढ़ाने के लिए सिर्फ तीन शिक्षक हैं। अमृत लाल के रहने से उनको काफी मदद मिलती है, जो दोपहर तीन से पांच बजे के बीच सभी कक्षाओं में पढ़ाई करवाते हैं। प्रभारी प्रधान पाठिका डॉ.सीमा भदौरिया के मुताबिक अमृत लाल मालवीय से बच्चों के साथ ही स्टाफ को भी मदद मिलती है। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण लोगों के लिए मिसाल की तरह है।