खेत में महका इश्क

यदि आपको बंजर जमीन में हरियाली लानी है तो इसका पाठ पेमाराम और उनकी पत्नी चनकू से सीख सकते हैं। दोनों का प्यार खेतों में महक रहा है। जब वे अपने हरे-भरे खेतों को एकसाथ देखते हैं तो बुढ़ापे में उनका प्रेम सबसे अलग दिखाई देता है।

यह दम्पती मरुभूमि राजस्थान के पचपदरा का है। दोनों ने रात-दिन की कड़ी मेहनत से पथरीली जमीन का सीना चीरकर कर वह कर दिखाया जो किसी करिश्मे से कम नहीं है। इस जमीन पर पैदावार किसी सपने से कम नहीं थी। आज उनके खेत में बेर के चार सौ पेड़ हैं। वे अपने खेत में बेर के साथ ही खड़े बोरड़ी, आंवले व नींबू के पौधों को संतान की तरह सींच रहे हैं।

निरक्षर काश्तकार पेमाराम राव और उनकी पत्नी चनकू ने लगभग 22 वर्ष पूर्व बंजर जमीन में बागवानी का संकल्प किया था। इस जमीन पर उनकी मेहनत को देखकर आसपास के लोग हंसते थे। लेकिन, दोनों ने कभी इसकी परवाह नहीं की। वे अपने मिशन को पूरा करने में रात- दिन जुटे रहे। उन्होंने अपने इस 16 बीघा जमीन में तीन अलग-अलग भाग बनाकर देशी बेर के करीब तीन सौ पौधे लगाए थे। इसके लिए उन्होंने काजरी से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने कलम तकनीक अपनाई।

खेत में पानी की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद उन्होंने आधा किमी दूर स्थित एक पेट्रोल पम्प पर लगे नल से घड़े भर कर पानी से पौधों को सींचा। इसके बाद उन्होंने पथरीली जमीन में दो गहरे टांकों की खुदाई की। उनके खेतों में पानी की व्यवस्था हो गई, जिसमें बारिश का पानी जमा रहने लगा। टांकों के पानी से पौधों को पानी मिलना लगा। उनकी मेहनत का फल सबको दिखाई देना लगा।

अब इस काश्तकार दम्पती को क्षेत्र में हर कोई जानता है। खेत में पैदा होने वाले मीठे बेर की मांग दूर-दूर तक बनी रहती है। काश्तकारों के लिए यह बुजुर्ग दम्पती आदर्श बन गया है। हालांकि, कमजोर आर्थिक स्थिति तथा सरकारी मदद का अभाव इस काश्तकार दम्पति के सपनों को साकार करने में बाधक बन रहा है। इस बार बेर के पौधों पर पैदावार नहीं होने तथा नींबू व आंवले की फसल के नष्ट होने से ये बुजुर्ग दम्पती हताश है, लेकिन इनकी हिम्मत दाद देने लायक है।

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