जल के लिए जंग

फ़रवरी 18, 2010

विश्व युद्ध के दौरान ईरान, इराक और इटली में सैनिक सेवाएं दे चुके नाथू बा उर्फ त्यागीजी मारवाड़ की धोरां धरती मे जल के लिए जंग लड़ रहे हैं। जोधपुर जिले की भोपालगढ़ तहसील के रतकुडिय़ा गांव के इस शख्स ने जल संरक्षण के लिए ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है कि इनके प्रयासों के आगे सरकारी योजनाएं भी बौनी पड़ जाती हैं। नौकरी से रिटायर होने के बाद करीब ४५ वर्षों से इनके जीवन का एक ही लक्ष्य है-जल संरक्षण। इसके लिए इन्होंने अपना घर-बार तक छोड़ दिया और तालाब के किनारे ही बना ली कुटिया। यह कुटिया ही आज उनका सब कुछ है। इसलिए ही लोग उन्हें त्यागीजी के नाम से पहचानते हैं। किसी के भी शादी हो या कोई और सामाजिक समारोह अथवा गांव का मेला। हाथ में एक डायरी लिए कसाय सी काया वाला, हल्की सफेद दाढ़ी बढ़ाए कंधे पर गमछा डाले जल संरक्षण के लिए ग्रामीणों से सहयोग मांगते दिखाई देते हैं।

तीन तालाब और दर्जनों टांके
नाथू बा जब फौज की नौकरी छोड़कर आए तो रतकुडिया गांव भीषण पेयजल संकट का सामना कर रहा था। सरकारी पाइप लाइन थी नहींं। बारिश का पानी ज्यादा नही टिकता। इस पर उन्होंने गांव वालों से मिलकर कुछ करने को कहा। कुछ ने साथ दिया, कुछ ने अनसुना कर दिया। नाथू बा ने हार नहीं मानी। पहले एक टांका खुदवाया और फिर तालाब। उन्होंने रतकुडिय़ा के रेतीले धोरों के बीच तीन पक्के तालाबों और करीब दो दर्जन से अधिक टांकों का निर्माण करवाया है। यही नहीं उन्होंने इन तालाबों के तलों में सीमेंट की फर्श और चारों ओर पक्की दीवारें बनवा दी, ताकि पानी लम्बे समय तक रह सके। बरसात का पानी संग्रहीत करने के लिए उन्होंने आसपास की पहाडिय़ों से बहकर आने वाले नालों को नहरों का रूप भी दे दिया।

अकाल में भी भरपूर पानी
नाथू बाबा की मेहनत अकाल में भी रंग ला रही है। रतकूडिय़ां से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित नाथूसागर पर आस पास की ढाणियां ही नहीं क्षेत्र के कई परिवार निर्भर है। मवेशियों के लिए भी इसमें साल भर पानी रहता है। इसके लिए तालाब के पास ही अलग हौद बना हुआ है। अकाल के वक्त आसपास के खेतों की फसलें भी नाथूसागर व अन्य तालाबों से सींच ली जाती है।

पक्षी सेवा भी
नाथू बाबा तालाब के लिए सहयोग राशि लेने पहुंचते है, लेकिन कई लोग नगदी की बजाय धान उनकी झोली में डाल देते हैं। इस धान का भण्डार पक्षी सेवा में काम आ रहा है। त्यागी बताते हैं कि रोजाना करीब एक बोरी अनाज कबूतरों व पक्षियों के लिए वे घर के पास ही बने चबूतरे पर डालते हैं। इन पर पूरे दिन लगा रहता है पक्षियों का जमघट।

गांव वालों ने किया काम का मान
नाथू बा को न तो आज तक सरकार और प्रशासन ने कोई सम्मान दिया और न ही कभी बाबा ने सम्मान की आशा की। लेकिन ग्रामीणों ने उनके प्रयासों का सम्मान करते हुए उनके द्वारा बनाए गए सबसे बड़े तालाब का नामकरण उनके नाम पर नाथूसागर कर जरूर उनके काम का मान किया।

इंजीनियर पोता-बहू अमरीका में
नाथू बा त्यागी दिखने में तो बहुत ही साधारण से नजर आते हैं, लेकिन उनके ज्येष्ठ पुत्र कंवराराम नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद मुम्बई में रह रहे हैं। त्यागीजी का पोता रामकिशोर और उसकी पत्नी दोनों ही पेशे से इंजीनियर है और अभी अमेरिका में सेवारत हैं। हालांकि नाबू बा अब बीमार रहने लगे हैं और उनका मिशन भी धीमे पडऩे लगा है, लेकिन उनके होंसलों में आज भी पहले जितने ही बुलंद हैं। वे कहते हैं कि टांके और तालाब ही उनके परिवार हैं। अंतिम सांस तक वे इनकी रक्षा करते रहेंगे।

जिओ तो सिर उठाकर…

फ़रवरी 13, 2010

हर कोई जिंदगी जीता है। लेकिन, एचआईवी पॉजिटिव दम्पती छत्रपाल और उनकी पत्नी रेखा का जीने का अदांज निराला है। इनके दिल में उमंगे है और लब पे अपने जैसे लोगों के लिए दुआएं। इन्हें देखकर तो यही सबक मिलता है कि जिंदगी खोने का नहीं, जीने का नाम है। वेलेन्टाइन डे पर प्रस्तुत है, राजस्थान में भरतपुर के एइस एचआईवी पॉजिटिव दम्पती के जिंदादिल हौसले से भरी दास्तां।

दस बरस से एचआईवी के साथ रह रहे छत्रपाल और उनकी पत्नी रेखा देवी आज मन की शक्ति और हंसकर जीने के दृढ़ संकल्प के चलते जिंदगी पर फतह करते नजर आते हैं। उनकी ग्यारह वर्षीय एक बेटी भी है,जो स्कूल में पढ़ रही है। कभी एचआईवी के अवसाद में डूबे छत्रपाल ने अपनी जिंदगी समाप्त करने की ठान ली थी, लेकिन आज वे अपनी पत्नी के संग सहायक काउंसलर बन एचआईवी पीडि़तों को जीने की राह दिखा रहे हैं। ऐसी राह जहां वे हौसले से जिएं और निसंकोच कह सकें, हां…हम पीएलएचए (पीपुल लिविंग विद एचआईवी एड्स) हैं!

38 वर्षीय छत्रपाल ग्रेजुएट हैं, पर आजीविका के लिए कभी ट्रक ड्राइविंग का कार्य करते थे और पूरे देश में घूमते थे। वे कहते हैं कि यात्रा के दौरान उन्होंने पेशेवर यौन संबंध बनाए। वर्ष 2004 की बात है। आगरा में जीजाजी की बीमार मां को रक्त की जरूरत पड़ी तो ब्लड टैस्ट करवाया और यह एचआईवी पॉजिटिव निकला। मुझे बताया गया कि मैं छह महीने से ज्यादा नहीं जिऊंगा। डिप्रेशन में मैंने पहली बार बेशुमार शराब पी और जब बोतल खाली हो गई तो फोड़कर अपने हाथ पर दे मारी। हाथ फट गया और खून का फव्वारा बह निकला। होश आया तो मैं अस्पताल में था और तब एहसास हुआ कि मैं मर नहीं सकता। हालांकि किसी दर्दीले सपने सा वह सच आज भी दहला जाता है, पर मेरे लिए प्रेरणा स्रोत भी यही घटना बनी। काउंसलर रामवीर ने मुझे जयपुर भेजा,जहां मैं आरएनपीप्लस (राजस्थान नेटवर्क पीपुल लिविंग विद एचआईवी) संपर्क में आया । एचआईवी संसार से बखूबी परिचित हुआ और जीने की कला सीखता चला गया।

एक दिसम्बर 2006 को विश्व एड्स दिवस पर रेखा से मुलाकात हुई। उसे देख मन में उससे ब्याह का खयाल आया। वह पति से संक्रमित होने के बाद विधवा हो गई। एक बच्ची की मां थी। 2008 में हम सामाजिक बहिष्कारों के चलते विवाह सूत्र में बंध गए। यह माना जाता है कि उत्तर भारत का यह पहला विवाह था, जो दो एचआईवी पीडि़तों ने किया था। रेखा सिंह आज छत्रपाल के संग बेहद खुश नजर आती हैं। बच्ची को एक पिता का भरपूर प्यार मिल रहा है, ससुराल में सब बेहद लाड़-प्यार और सम्मान से रखते हैं। बझेरा के ‘अपना घर’ में वे अपनी नर्सिंग सेवाएं दे रही हैं और दोनों आत्मनिर्भर हैं…भला और क्या चाहिए…?

रेखा बताती हैं कि अब तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि आम लोगों से वे किसी बात में बेमेल हैं। कभी जरूरत पड़ती है तो पूरा परिवार एआरटी (एंटी टिटो वायरल थैरेपी) भी लेता है। यह वैक्सीन स्वस्थ कर देती है और उम्र बढ़ाती है। शेष जीवन-मरण ऊपर वाले के हाथ में है, पर जब तक जिंदा हैं, जिंदादिली साथ है। अपने साथियों से गुजारिश है कि एचआईवी को एड्स न समझें। एचआईवी के साथ जिया जा सकता है और जिंदगी का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

हौसले का एक चिराग तुम जलाओ, उम्मीदों के हजार दीप, जिंदगी की अगवानी में जल उठेंगे…

वाह! मुक्कू, तेरा जज्बा

फ़रवरी 12, 2010

जयपुर के अब्दुल मुकति उर्फ मुक्कू की दाद देनी होगी। आठ साल के इस बालक ने अबुधाबी में पॉलिथीन बैग्स के खिलाफ जो अभियान छेड़ा है, उससे वह सबकी आंखों का तारा बन गया है। इस अभियान का असर यह हुआ कि काफी लोग पॉलिथीन बैग्स के बजाय कागज के बैग्स इस्तेमाल करने लगे हैं।

टीवी पर एक विज्ञापन आता है। इसमें लाइट्स पर कार बंद नहीं करने पर उसमें बैठा एक बालक अपने पिता से कहता है-मैं बड़ा होकर साईकिल रिपेयरिंग की दुकान खोलूंगा। यह बात सुनकर पिता हतप्रभ होता है। लेकिन बालक अपनी बात आगे बढ़ाता है-आप लोग जिस तरह पेट्रोल की बरबादी कर रहे हैं, उससे तो कुछ समय बाद पेट्रोल ही नहीं बचेगा। इस पर पिता तत्काल ही लाइट्स पर अपनी कार रोक देता है। यह बात तो सिर्फ विज्ञापन की है, लेकिन असली जिंदगी में आछ साल का बालक अब्दुल मुकति कुछ इसी स्टाइल में पर्यावरण बचाने की मुहिम चला रहा है।

मुकति का यह अभियान इसीलिए लाजवाब है, क्योंकि जब ज्यादातर लोग पर्यावरण के खतरों से वाकिफ होते ही अनजान बने हैं, तब यह बालक अपने अभियान से लोगों को पर्यावरण बचाने की सीख दे रहा है। उसके इस ‘नो पॉलिथीन बैग’ अभियान में 50 स्कूलों के लगभग एक हजार नन्हे-नन्हे बालक जुड़े हैं। ये बच्चे कागजों के बैग्स बांट कर आमजन और दुकानदारों को पॉलिथीन बैग्स का इस्तेमाल नहीं करने का संदेश दे रहे हैं। इसके लिए मुकति को संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख अखबार गल्फ न्यूज ने सम्मानित कर उसकी खबर प्रमुखता से प्रकाशित की।

मुकति को पॉलिथीन बैग्स के खिलाफ अभियान की प्ररेणा अपने स्कूल में ही मिली। कुछ समय पहले पर्यावरण दिवस पर पॉलिथीन बैग्स के इस्तेमाल से पर्यावरण को होने वाले खतरों की बात मुकति के दिलो-दिमाग में बैठ गई। उसने तभी संकल्प किया कि वह पर्यावरण को बरबाद होने से बचाने के लिए अभियान चलाएगा। बकौल मुकति, मैंने घर पर कागजों को एकत्रित कर उसके बैग्स तैयार किए और आसपास के शॅपिंग सेंटरों पर गिफ्ट कर दिए।

इन प्रयासों को सराहा गया। इससे नन्हे मुकति को हौसला मिला। इसके बाद वह रोजाना दो घण्टे का समय निकालकर कागज के बैग्स बनाने शुरू कर दिए। वह इन्हें आसपास के दुकानदारों में बांट देता। मुकति के प्रयासों की धीरे-धीरे चर्चा होने लगी। मुकति को देखकर उसके सहपाठी भी कागज के बैग्स तैयार करने लगे। इस अभियान को अबुधाबी में जबरदस्त जनसमर्थन मिला और दुकानदारों में मुकति के बैग्स की मांग बढऩे लगी। मुकति के अनुसार हम लगभग एक हजार छात्र रोजाना समय निकाल कर इस तरह के बैग्स बनाते हैँ।

मुकति की मां अंदलीब मनान का कहना है कि उन्हें भरोसा ही नहीं होता कि आठ साल का एक बच्चा इतना बड़ा अभियान चला सकता है। जब हम मुकति के प्रयासों को देखते हैं तो बड़ा गर्व होता है। मुकति ने अन्य बच्चों को जोडऩे के लिए कागज की फैँसी ड्रेस बनाई। इससे काफी बच्चे आकर्षित हुए और उसके साथ जुड़ते चले गए। किसी अच्छे काम के लिए कोई आयु नहीं होती, बस प्ररेणा की जरूरत होती है।

…चढ़ गई धनीराम की बलि

फ़रवरी 11, 2010

पंचायत चुनाव में हार के बाद धनीराम की आत्महत्या मरुप्रदेश पर बदनुमा दाग है। नोटों का जिस तरह अनाप-शनाप प्रदर्शन हुआ है, उससे पंचायती राज की चुनाव प्रणाली भी कटघरे में आ गई है। हम सबको अब सीख लेने की जरूरत है।

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव पूरे हो चुके हैं। जो जीते, उन्हें अपनी सफलता पर नाज होना स्वाभाविक है। लेकिन, इस माहौल के बीच एक बुरी खबर भी है। यह कि अलवर जिले में मालाखेड़ा के पास महुवा गांव में चुनाव के बाद महिला उम्मीदवार के पति ने आत्महत्या कर ली। वह अपनी पत्नी की हार का सदमा सहन नहीं कर पाया और उसने जान दे दी। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, मौत का कारण भी हार तक ही सीमित नहीं था। इससे भी आगे एक कड़ी जुड़ी थी। वह थी कर्ज की।

पंचायत समिति के सदस्य के चुनाव के लिए जब धनीराम जाटव ने अपनी पत्नी कस्तूरी देवी को खड़ा किया था, तब उसने गांव से ही करीब डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया था। यह राशि चुनाव में वोटरों को रिझाने में खर्च की गई। बाद में चुनाव परिणाम आए तो उसमें कस्तूरी देवी पिछड़ गई। यानी उसे चुनाव में पराजय देखनी पड़ी। हार के बाद धनीराम को आत्महत्या करने के अलावा कोई तरीका नहीं सूझा।

यह मामला लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह पंचायती राज चुनाव में घुस आई बुराईयों को इंगित करता है। धनीराम को पहले उनके आसपास के लोगों ने चुनाव में खड़े होने के लिए प्रेरित किया और बाद में मतदान के समय उससे मुंह मोड़ लिया। आमतौर पर गांवों में अब यही होने लगा है कि जिन लोगों को निपटाना होता है, उन्हें चुनाव में खड़े होने का ज्ञान देने वाले बहुत लोग सामने आ जाते हैं। बाद में उन्हें ‘निपटा दियाÓ के अदांज में हरा दिया जाता है। दूसरी बात यह भी है कि नरेगा के जरिए गांवों में जिस तरह पानी की तरह पैसा आ रहा है, उससे गांवों के इस चुनाव की तस्वीर बदल गई है। अब गांवों में चुनाव लडऩे वालों की फौज तैयार हो गई है।

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में भी नरेगा की तरह ही पैसा बहा है। उम्मीदवारों ने चुनाव के लिए जमीन-घर तक गिरवी रख दी। जैसा कि महुआ के गांव वाले बताते हैं कि धनीराम ने भी अन्य उम्मीदवारों के सामने डटे रहने के लिए कर्ज से पैसे की व्यवस्था की थी। खबर तो यहां तक है कि धनीराम के क्षेत्र में उम्मीदवारों ने चुनाव में 50-60 लाख रुपए तक खर्च किए। ऐसे में चुनाव में पैसे का महत्व बढऩा आश्चर्य की बात दिखाई नहीं देती।

कोई संदेह नहीं कि नरेगा का पैसा राजस्थान के गांवों का स्तर बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। लेकिन, भ्रष्टाचार की शिकायतें भी कम नहीं हैं। जो उम्मीदवार चुनाव में लाखों रुपए खर्च करके पंचायत में बैठेगा, उससे कैसे उम्मीद करे कि उसका दामन पाक साफ होगा। फिर भ्रष्ट नौकरशाहों की कड़ी तो पहले ही काफी सक्रिय है। इन्हें पैसे दो, आपके काम तत्काल मंजूर होंगे। ऐसे में चुनाव खर्च की भरपाई और काम स्वीकृत कराने के लिए भ्रष्ट तरीके इस्तेमाल करने ही पड़ेगा। जब यह स्थिति रहेगी तो केवल धनीराम ही नहीं, और भी ऐसे सीधे-साधे लोग आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर होंगे।

खेत में महका इश्क

फ़रवरी 10, 2010

यदि आपको बंजर जमीन में हरियाली लानी है तो इसका पाठ पेमाराम और उनकी पत्नी चनकू से सीख सकते हैं। दोनों का प्यार खेतों में महक रहा है। जब वे अपने हरे-भरे खेतों को एकसाथ देखते हैं तो बुढ़ापे में उनका प्रेम सबसे अलग दिखाई देता है।

यह दम्पती मरुभूमि राजस्थान के पचपदरा का है। दोनों ने रात-दिन की कड़ी मेहनत से पथरीली जमीन का सीना चीरकर कर वह कर दिखाया जो किसी करिश्मे से कम नहीं है। इस जमीन पर पैदावार किसी सपने से कम नहीं थी। आज उनके खेत में बेर के चार सौ पेड़ हैं। वे अपने खेत में बेर के साथ ही खड़े बोरड़ी, आंवले व नींबू के पौधों को संतान की तरह सींच रहे हैं।

निरक्षर काश्तकार पेमाराम राव और उनकी पत्नी चनकू ने लगभग 22 वर्ष पूर्व बंजर जमीन में बागवानी का संकल्प किया था। इस जमीन पर उनकी मेहनत को देखकर आसपास के लोग हंसते थे। लेकिन, दोनों ने कभी इसकी परवाह नहीं की। वे अपने मिशन को पूरा करने में रात- दिन जुटे रहे। उन्होंने अपने इस 16 बीघा जमीन में तीन अलग-अलग भाग बनाकर देशी बेर के करीब तीन सौ पौधे लगाए थे। इसके लिए उन्होंने काजरी से मार्गदर्शन लेकर उन्होंने कलम तकनीक अपनाई।

खेत में पानी की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद उन्होंने आधा किमी दूर स्थित एक पेट्रोल पम्प पर लगे नल से घड़े भर कर पानी से पौधों को सींचा। इसके बाद उन्होंने पथरीली जमीन में दो गहरे टांकों की खुदाई की। उनके खेतों में पानी की व्यवस्था हो गई, जिसमें बारिश का पानी जमा रहने लगा। टांकों के पानी से पौधों को पानी मिलना लगा। उनकी मेहनत का फल सबको दिखाई देना लगा।

अब इस काश्तकार दम्पती को क्षेत्र में हर कोई जानता है। खेत में पैदा होने वाले मीठे बेर की मांग दूर-दूर तक बनी रहती है। काश्तकारों के लिए यह बुजुर्ग दम्पती आदर्श बन गया है। हालांकि, कमजोर आर्थिक स्थिति तथा सरकारी मदद का अभाव इस काश्तकार दम्पति के सपनों को साकार करने में बाधक बन रहा है। इस बार बेर के पौधों पर पैदावार नहीं होने तथा नींबू व आंवले की फसल के नष्ट होने से ये बुजुर्ग दम्पती हताश है, लेकिन इनकी हिम्मत दाद देने लायक है।

फीस में सिर्फ मुस्कुराहट

फ़रवरी 9, 2010

वेलेन्टाइन डे का बेसब्री से इंतजार कर रहे युवाओं के लिए जबलपुर के डॉ. जगत सिंह आहूजा और उनकी पत्नी आशा देवी की जोड़ी मिसाल है। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके दोनों का प्यार परोपकारी के राह पर मजबूत डोर में बंधा है। दोनों ही बिना किसी स्वार्थ के पीडि़त मानवता की सेवा में जुटे हुए हैं।

कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो उम्र आड़े नहीं आती। उम्र के 71 वसंत पार कर चुके डॉ. जगत सिंह आहूजा मरीजों के घर-घर जाकर उनका नि:शुल्क उपचार करते हैं। लोग उन्हें चलता-फिरता दवाखाना मानने लगे हैं। पीडि़त मानवता की सेवा को जीवन का लक्ष्य मान चुके डॉ. आहूजा एम.पी.एस.ई.बी में सहायक इंजीनियर रहे हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद पिछले दस साल से वह पीडि़तों का उपचार कर रहे हैं। लोग विश्वास से इलाज करा सकें, इसलिए वह अपने आयुर्वेद चिकित्सा, विटामिन थैरेपी, शिक्षा संबंधी प्रमाण पत्र साथ लेकर भी चलते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं सेवा भावना से कार्य कर रहा हूं। मेरा मरीज ठीक होकर मुस्कुरा दे, यही मेरी फीस है..।Ó परोपकारी के इस काम में उनकी पत्नी आशा देवी सहभागी रहती हैं।

साइकिल से सफर
इस उम्र में भी डॉ. आहूजा साइकिल चलाते हैं। वह सुबह दस बजे घर से साइकिल पर निकलते हैं। शहर में अलग-अलग स्थानों पर जाकर रोगियों को उपचार मुहैया कराते हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन करीब 100 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। दमा, डायबिटीज, अस्थमा, पीलिया, वातरोग आदि की दवा देते हैं। वह तब तक मरीज के घर जाते रहते हैं, जब तक वह पूर्णत: स्वस्थ नहीं हो जाए।
एक वक्त भोजन
डॉ. आहूजा केवल एक वक्त भोजन करते हैं। उनके पास चिकित्सा शिक्षा से संबंधित सैकड़ों पुस्तकें हैं। सभी निरोगी रहें, यही उनकी कामना है। डॉ. आहूजा का मानना है कि तैराकी और साइकिलिंग सबसे अच्छा योग है। साइकिलिंग से बॉडी फिट रहती है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए भी साइकल बेहतर है। उन्होंनेे साइकिल के अलावा दूसरा कोई वाहन नहीं चलाया। उनकी तमन्ना साइकिल से भारत भ्रमण करने की है।

वांगचुक से सीखें, कैसी हो शिक्षा

फ़रवरी 7, 2010

लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है। यह सब कमाल किया लद्दाखी इडियट सोनम वांगचुक ने।

लेह से थोड़ी दूरी पर फे गांव में गैर-सरकारी संगठन सेकमॉल की इमारत है। यह कोई सामान्य इमारत नहीं है, बल्कि लद्दाख में शिक्षा के दिखाई दिए नए चेहरे की रचयिता है। यहीं से सोनम वांगचुक लद्दाख में शिक्षा को जनोन्मुखी बनाने की अपनी मुहिम चला रहे हैं। यह मुहिम आज सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक आईना बन चुकी है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद हम अपनी शिक्षा पद्धति को जनता की जरूरत के अनुरूप नहीं बना पाए हैं। वांगचुक ने लद्दाख में मैकाले आधारित शिक्षा में बदलाव के लिए लम्बा संघर्ष किया और इसमें वह रोशनी का नायक बनकर उभरा।

वांगचुक के कामकाज को देखकर सहसा आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्सÓ के किरदार फुनसुक वांगडुग की याद आने लगती है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद शिक्षा को नया आयाम देने लद्दाख पहुंचता है। ऐसा एहसास होता है कि आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ के वांगडुग का किरदार सोनम वांगचुक की जिंदगी पर रचा गया। वांगचुक को आप और हम असली जिंदगी में ..लद्दाखी इडियट.. का नाम दे सकते हैं। लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है।

वांगचुक ने दुनिया की इस खूबसूरत वादियों में शिक्षा में बदलाव लाने की नींव 1988 में रखी। तब वह सिविल इंजीनियर बनकर लद्दाख लौटे थे। उस समय स्कूल की पढ़ाई आसान नहीं थी। आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम उर्दू था और उसके बाद नौंवी और दसवीं में पूरी शिक्षा अंग्रेजी में होती थी। वांगचुक खुद भी फेल हो गए। बाद में वह इंजीनियर बनने के लिए चले गए। जब वापस लौटे तो उन्हें वहां की शिक्षा के ढर्रे में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया।

बकौल वांगचुक, अगर असफलता का प्रतिशत 95 था तो इसका मतलब है कि पूरी प्रणाली में ही कुछ खामी है। हालांकि दिक्कतें इससे भी अधिक गहरी थी। सबसे बड़ी समस्या थी भाषा, प्रशिक्षित शिक्षक और ऐसे पाठ्यक्रम की, जो 11,000 फीट की ऊंचाई पर रहने वाले छात्रों का भविष्य संवार सके। केवल पांच फीसदी बच्चे ही दसवीं उत्तीर्ण कर पाते थे। बेहद चिन्ताजनक हालात थे। इसलिए वहां जरूरत थी बदलाव की, क्योंकि शिक्षा का मतलब पढऩा, लिखना और याद करना नहीं है। लद्दाखी शिक्षा का अर्थ है तेज दिमाग, कुशल हाथ और कोमल हृदय वाले होनहार छात्र।

वांगचुक ने लद्दाखी भाषा और संस्कृति के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने, स्कूल चलाने और प्रशिक्षित शिक्षक तैयार करने के लिए वहां के समुदाय को संगठित किया। शिक्षा में बदलाव के लिए त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई। इसके तहत गांवों में शिक्षा समितियां बनार्ई गई, शिक्षक प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराई गई और भाषा एवं संस्कृति ज्ञान पर ध्यान दिया। अभियान का बीडा ससपोल गांव के एक स्कूल से शुरू हुआ, जो श्रीनगर मार्ग पर पड़ता है। मेहनत रंग लाई और वहां की सरकार ने 1992 में प्राइमरी स्तर पर अंग्रेजी को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया। यह राय बनी कि अंग्रेजी की जानकारी के बगैर लद्दाखियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिल सकती। इससे लद्दाख के स्कूलों में सुधार का शैक्षिक मॉडल विकसित हो गया।

वांगचुक ने अपना अभियान सुचारू चलाने के लिए ‘एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (सेकमॉल) बनाई। इसके तहत 1994 में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन न्यू होप’ से लद्दाख के शिक्षा मॉडल में परिवर्तन की बयार बहने लगी। यह ऐसा अभियान था, जिसमें वांगचुक और उनकी साथियों ने सरकार और पूरे समुदाय का दिल जीता। वर्ष 1996 में हिल काउन्सिल ने वांगचुक के सहभागिता मॉडल को स्वीकार कर लिया। उन्होंने शिक्षकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और पाठ्यक्रम को बदल दिया। किताबों में शिक्षाप्रद बातों के अलावा लद्दाखी रीति-रिवाजों और पर्यावरण को लेकर जानकारी दी जाने लगी थी। इस कड़ी मेहनत का नतीजा कुछ दिनों में सामने आने लगा और 2002 में उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या पांच से बढ़कर 50 फीसदी हो गई।

फे में सेकमॉल का आवासीय परिसर शिक्षा में बदलाव की बेहतरीन मिसाल है। इसमें छात्रों के सम्पूर्ण विकास की दृष्टि से गतिविधियां चलती हैं। पढ़ाई का तरीका स्कूल पाठ्यक्रम से हटकर है। छात्रों को लद्दाखी संस्कृति और विरासत का ज्ञान कराने के साथ ही जीवन कौशल की सीख दी जाती है। यहां वरिष्ठ छात्र मामूली फीस देकर रह सकते हैं। शिक्षक बनने की चाहत रखने वाले लोगों को आर्थिक मदद दी जाती है। यह परिसर पूर्णतय: सौर ऊर्जा पर आधारित है। 16-24 पेनल के चार ऐरो बिजली उत्पादित करते हैं। इनसे कम्प्यूटर और टीवी चलते हैं। सामुदायिक रसोई में दो सोलर कूकर हैं। इनके लिए पेसिव सोलर डिजाइन का इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा कम कीमत का वाटर हीटर लगाया हुआ है। सेकमॉल की ओर से डिजाइन किए गए सौ लीटर के एक सोलर हीटर की कीमत 3500 रुपए है, जबकि इसी क्षमता का वाणिज्यिक हीटर 25000 रुपए में आता है।

वर्ष 2000 में वांगचुक ने खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘शेसन सोलर अर्थवक्र्सÓ बनाई। यह प्राइवेट, सरकारी, एनजीओ और सेना के लिए सोलर बिल्डिंग का निर्माण करती है। इसकी कमाई शैक्षिक सुधार और पर्यावरण जागरूकता पर खर्च होती है। शुरूआती दौर में वांगचुक के अभियान का खर्च संस्थापक सदस्यों के सहयोग से चलता था, लेकिन अब वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका आधा खर्च सेकमॉल प्रकाशन कीकिताबों की बिक्री, शैक्षिक सहायता, ईको-टूरिज्म और सोलन बिल्डिंग निर्माण से निकलता है।

पौधा रोपकर जन्मदिन का उत्सव

फ़रवरी 6, 2010

सुबह के ठीक 10 बजे… जबलपुर में जन्मदिन का अनोखा उत्सव। इस मौके पर न तो केक काटा जाता है, ना ही पार्टी दी जाती है। लोग पौधा रोपकर जन्मदिन मनाते हैं। यह उत्सव एक… दो… तीन… नहीं, लगातार 2011 दिन (छह साल) से चल रहा है। कदम संस्था के योगेश गनोरे ने इस क्रम को उस वक्त भी रुकने नहीं दिया, जब उनका एकमात्र बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा था। कारवां चलता गया और लोग जुड़ते गए। अब यह अभियान जबलपुर से बाहर निकलकर गाडरवारा, दमोह, टीकमगढ़, कटनी, भोपाल और बड़वानी तक पहुंच गया है। कदम संस्था के सदस्य कनाडा, डेट्रायट अमेरिका और रूस में भी पौधा लगाकर अपना जन्मदिन मना रहे हैं। उनकी हसरत इस अभियान को पूरी दुनिया में पहुंचाने की है।

पौधा रोपकर जन्मदिन मनाने को प्रथा बनाने के मकसद से यह अभियान 17 जुलाई, 2004 से जबलपुर में शुरू किया गया। शुरुआती दौर में लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि यह काम निरंतर चलता रहेगा। पहले हफ्ते, फिर महीने, उसके बाद साल और अब छठवें साल में प्रवेश कर चुके इस अभियान में कई जानी-मानी हस्तियां भी पौधारोपण कर जन्मदिन मना चुकी हैं। इनमें गायत्री परिवार के मुखिया डॉ. प्रणव पंडया, समाजसेविका मेधा पाटकर, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी, पूर्व महापौर विश्वनाथ दुबे शामिल हैं। अभी तक सैकड़ों लोग पौधा रोपकर अपनी सालगिरह मना चुके हैं। इस अभियान को समय प्रबंधन की भी मिसाल माना जाता है। सुबह 10 बजे शुरू होने वाला अभियान 10:15 बजे समाप्त हो जाता है।

योगेश गनोरे के मन में जन्मदिन पर पौधा लगाने की कल्पना 25 वर्ष पहले आई। इस कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने अपने परिचितों और मित्रों को जन्मदिन पर पौधा लगाने के लिए पोस्टकार्ड लिखना शुरू किया। उनका जन्मदिन 17 मई को आता है। गर्मी में पौधा लगाना और उसे बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती थी। उन्हें जब इस काम में सफलता मिलने लगी तो उनके मन में ख्याल आया कि यह रोज क्यों नहीं हो सकता। जबलपुर के तत्कालीन महापौर विश्वनाथ दुबे को यह ख्याल इतना पसंद आया कि वह पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड देने के लिए राजी हो गए। उसके बाद सिलसिला चल पड़ा।

दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ कि किसी पौधे की सुरक्षा गोल्डन ट्री के जरिए की जा रही हो। कदम संस्था के अभियान का 1000वां पौधा 12 अप्रेल, 2006 को जबलपुर के भंवरताल गार्डन में रोपा गया, जिसकी सुरक्षा के लिए गोल्डन ट्री लगाया गया।
योगेश गनोरे का सपना दुनिया को युद्ध से मुक्त करने का है। इस सपने को पूरा करने के लिए वह इजरायल और फिलीस्तीन के बीच गाजापट्टी पर प्लांट फॉर पीस लगाना चाहते हैं। इस अभियान में दुनियाभर के राजनायकों को बुलाने की योजना है। उनका कहना है कि जिस दिन वह इसमें कामयाब होंगे, उनकी जिंदगी का वह सबसे खुशनुमा लम्हा होगा।

पर्यावरण प्रेम में रंगे रंगा

फ़रवरी 6, 2010

राजस्थान के फलौदी जिले में जन्मे नरसिंह रंगा भले अल्प शिक्षित हों, लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी सोच और काम देखकर बड़े-बड़े पर्यावरणविद् अचंभित हो जाते हैं। आठवीं कक्षा पास करने के बाद रंगा मामा के साथ टिम्बर के व्यवसाय से जुड़ गए। लकड़ी की कटाई के लिए मध्यप्रदेश के जंगलों में घूमते रंगा के मन में एक दिन यह विचार आया कि हर आदमी जंगल काटने पर आमादा है। आखिर जंगल लगाने वाले भी तो होने चाहिए। जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर नर्मदा किनारे बसे ग्राम बासनियाकलां के पास उनकी थोड़ी जमीन थी। उन्होंने देखा कि हर साल नर्मदा की बाढ़ में उनकी जमीन कटती जा रही है। वह परेशान हो उठे। उन्होंने इस जमीन को बचाने की ठान ली।

सन् 1992 से उन्होंने नर्मदा के किनारे की जमीन पर बांस के पौधे रोपे। पौधे रोपने का नशा ऐसा चढ़ा कि वह नर्मदा किनारे जमीन खरीदते गए और पौधे रोपते गए। करीब दस साल में उन्होंने एक हजार एकड़ जमीन खरीदकर उस पर जंगल खड़ा कर दिया। इस समय इस जमीन पर लाखों की तादाद में बांस, खमेर, नीलगिरी के पेड़ खड़े हैं। यह सब उन्होंने बिना किसी शासकीय या गैर शासकीय मदद के किया है। जंगल से जमीन पर कटाव तो रुका ही, अब यह जंगल उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी बन गया है। वह इससे हर साल लाखों रुपए कमाते हैं। उनके जंगल को देखने प्रदेश और देश के कई पर्यावरणविद् और जंगल महकमे के अधिकारी आ चुके हैं। कई विदेशी पर्यावरणप्रेमी भी रंगा प्लांटेशन का भ्रमणकर उसकी तारीफ कर चुके हैं।

रंगा कहते हैं कि नर्मदा को बचाना है तो उनके दोनों किनारों पर सघन हरित पट्टी विकसित करनी होगी। इससे नर्मदा भी बचेगी और कटाव भी रुकेगा। खेती को यदि लाभ का धंधा बनाना है तो इससे बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है। रंगा ने जंगल की देखरेख रोकने अनोखा तरीका अपनाया है। नजदीकी ग्रामीणों को सब्जी और फसल उगाने के लिए वह जमीन फ्री उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण जंगल की देखरेख करते हैं और चोरी जैसी घटनाएं नहीं होतीं।

न डरूंगा न किसी को डरने दूंगा

फ़रवरी 4, 2010

एचआईवी पॉजीटिव राजपालसिंह शेखावत जगाते हैं बीमारी से लडऩे का जज्बा
अगर डर गया होता तो शायद जिंदा नहीं बचता और ना ही उन लोगों को हौसला दे पाता, जो मेरी तरह हैं। मेरा भरोसा देख कई लोगों में बीमारी से लडऩे की ताकत पैदा हो जाती है। भगवान ने मुझे न जाने कहां से यह हिम्मत दे डाली कि एचआईवी पॉजीटिव होने का पता चलने के बावजूद चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। खुद जीने की चाह और यही चाहत औरो में पैदा करने का संकल्प लिए एड्स पीडि़तों के लिए काम कर रहा हूं। हिम्मत भरे यह अल्फाज हैं 42 साल के राजपालसिंह शेखावत के। वह पिछले सात साल से मध्यप्रदेश के झाबुआ में रह रहे हैं। दो साल पहले उन्हें पता चला कि शरीर को ऐसी बीमारी लग गई, जिसका इलाज साइंसदान अब तक ढूंढ नहीं सके हैं।

वह साथी हैं जीवन ज्योति संस्था मेघनगर के परियोजना प्रबंधक जिमी निर्मल के। जिमी और वह मिलकर झाबुआ और आलीराजपुर में पॉजीटिव मरीजों की तलाश करते हैं, उन्हें एड्स के बारे में पूरी तरह से समझाइश देते हैं और इससे नहीं डरने की सलाह भी। उनके साथी जिमी बताते हैं कि बीते कई साल से इस फील्ड में काम कर रहा हूं, लेकिन राजपालजी के साथ होने से काम को गति मिली। जब कोई पीडि़त व्यक्ति खुद बीमारों तक जाकर उन्हें समझाता है तो उसका असर कुछ ज्यादा होता है।

शेखावत कहते हैं कि आगे जो होना है सो होकर रहेगा, लेकिन आज को जीने की चाहत ही सबसे बड़ी ताकत है। मुझमे वो ताकत है, जो अपने साथियों में बांटने की कोशिश करता हूं। जब मुझे पता चला कि एचआईवी पॉजीटिव हूं, तब जीने की सारी उम्मीद खत्म हो गई। एक महीने तक निराशा से जूझता रहा। जीवन ज्योति मेघनगर के लोगों ने मुझे समझाया की डरने की जरूरत नहीं है। उनकी बातों से कुछ करने को बल मिला और मैंने वॉलंटरी वर्क शुरू कर दिया। आठ महीने तक जीवन ज्योति हेल्थ सर्विस सोसायटी के साथ इस क्षेत्र में काम किया। फिर फील्ड में काम करने लगा। अब गांव-गांव जाकर मरीज ढूंढते हैं और उन्हें समझाते हैं।

जुलाई 2008 में एक नेटवर्क बनाया, ‘झाबुआ नेटवर्क ऑफ पीपल लीविंग विथ एचआईवी एड्सÓ। आज इस नेटवर्क में 120 पॉजीटिव सदस्य हैं। एक पूरा परिवार बन चुका है, जो हर महीने एक से दो बार मिलता है और अपने दु:ख-दर्द आपस में बांटता है। अब राजपालसिंह और भी पॉजीटिव मरीजों को इस मुहिम से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं। मरीजों को आयवद्र्धक कार्यक्रमों से जोडऩे के लिए प्लान तैयार कर रहे हैं।

वह खुद को सामान्य व्यक्ति की तरह मानते हैं और ऐसा ही व्यवहार करते हैं। हालांकि कभी-कभार कुछ घटनाएं दिल दुखाने वाली भी सामने आती हैं। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि इंदौर में एक पुलिस वाले ने मोटर साइकिल पर लिफ्ट मांगी। वह सब इंस्पेक्टर था। रास्ते में बातचीत हुई तो उसने सवाल किया, क्या करते हो। मंने जवाब दिया एड्स पीडि़त हूं और पीडि़तों के लिए काम करता हूं। इतना सुनना था कि उसने गाड़ी रुकवाई और कुछ काम का बहाना कर वहां से भाग गया।

राजपालसिंह कहते हैं कि बीमारी को लेकर आम लोगों में जागरुकता की कमी है। यही कारण है कि पीडि़तों को अलग-थलग कर दिया जाता है। शहर और गांव सभी जगह यही हाल हैं। सरकारी अस्पतालों में भी पीडि़तों की केयर नहीं होती। सुविधाओं का अभाव बताकर उन्हें इंदौर जाने के लिए कह दिया जाता है। कुछ भी हो ,आखिरी सांस तक मैं यही कोशिश करूंगा कि लोग समझें और ऐसे लोगों को सामान्य जीवन जीने दें। न तो खुद डरूंगा और न ही अपने साथियों को डरने दूंगा।