…चढ़ गई धनीराम की बलि

पंचायत चुनाव में हार के बाद धनीराम की आत्महत्या मरुप्रदेश पर बदनुमा दाग है। नोटों का जिस तरह अनाप-शनाप प्रदर्शन हुआ है, उससे पंचायती राज की चुनाव प्रणाली भी कटघरे में आ गई है। हम सबको अब सीख लेने की जरूरत है।

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव पूरे हो चुके हैं। जो जीते, उन्हें अपनी सफलता पर नाज होना स्वाभाविक है। लेकिन, इस माहौल के बीच एक बुरी खबर भी है। यह कि अलवर जिले में मालाखेड़ा के पास महुवा गांव में चुनाव के बाद महिला उम्मीदवार के पति ने आत्महत्या कर ली। वह अपनी पत्नी की हार का सदमा सहन नहीं कर पाया और उसने जान दे दी। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, मौत का कारण भी हार तक ही सीमित नहीं था। इससे भी आगे एक कड़ी जुड़ी थी। वह थी कर्ज की।

पंचायत समिति के सदस्य के चुनाव के लिए जब धनीराम जाटव ने अपनी पत्नी कस्तूरी देवी को खड़ा किया था, तब उसने गांव से ही करीब डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया था। यह राशि चुनाव में वोटरों को रिझाने में खर्च की गई। बाद में चुनाव परिणाम आए तो उसमें कस्तूरी देवी पिछड़ गई। यानी उसे चुनाव में पराजय देखनी पड़ी। हार के बाद धनीराम को आत्महत्या करने के अलावा कोई तरीका नहीं सूझा।

यह मामला लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह पंचायती राज चुनाव में घुस आई बुराईयों को इंगित करता है। धनीराम को पहले उनके आसपास के लोगों ने चुनाव में खड़े होने के लिए प्रेरित किया और बाद में मतदान के समय उससे मुंह मोड़ लिया। आमतौर पर गांवों में अब यही होने लगा है कि जिन लोगों को निपटाना होता है, उन्हें चुनाव में खड़े होने का ज्ञान देने वाले बहुत लोग सामने आ जाते हैं। बाद में उन्हें ‘निपटा दियाÓ के अदांज में हरा दिया जाता है। दूसरी बात यह भी है कि नरेगा के जरिए गांवों में जिस तरह पानी की तरह पैसा आ रहा है, उससे गांवों के इस चुनाव की तस्वीर बदल गई है। अब गांवों में चुनाव लडऩे वालों की फौज तैयार हो गई है।

राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में भी नरेगा की तरह ही पैसा बहा है। उम्मीदवारों ने चुनाव के लिए जमीन-घर तक गिरवी रख दी। जैसा कि महुआ के गांव वाले बताते हैं कि धनीराम ने भी अन्य उम्मीदवारों के सामने डटे रहने के लिए कर्ज से पैसे की व्यवस्था की थी। खबर तो यहां तक है कि धनीराम के क्षेत्र में उम्मीदवारों ने चुनाव में 50-60 लाख रुपए तक खर्च किए। ऐसे में चुनाव में पैसे का महत्व बढऩा आश्चर्य की बात दिखाई नहीं देती।

कोई संदेह नहीं कि नरेगा का पैसा राजस्थान के गांवों का स्तर बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। लेकिन, भ्रष्टाचार की शिकायतें भी कम नहीं हैं। जो उम्मीदवार चुनाव में लाखों रुपए खर्च करके पंचायत में बैठेगा, उससे कैसे उम्मीद करे कि उसका दामन पाक साफ होगा। फिर भ्रष्ट नौकरशाहों की कड़ी तो पहले ही काफी सक्रिय है। इन्हें पैसे दो, आपके काम तत्काल मंजूर होंगे। ऐसे में चुनाव खर्च की भरपाई और काम स्वीकृत कराने के लिए भ्रष्ट तरीके इस्तेमाल करने ही पड़ेगा। जब यह स्थिति रहेगी तो केवल धनीराम ही नहीं, और भी ऐसे सीधे-साधे लोग आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर होंगे।

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