उनके खजाने में हैं टकसाल की गलतियां

फ़रवरी 4, 2010

मिस प्रिंट नोटों से लेकर गलत ढले सिक्कों का कलेक्शन, गलत मुद्रा को चलन से बाहर करने की कोशिश
मध्यप्रदेश में उज्जैन के बृजमोहन खंडेलवाल के खजाने में जमा नोट और सिक्के अपनी मूल कीमत से कई गुना ज्यादा कीमती हैं। हकीकत में टकसाल की गलतियों के कारण बाजार में आ गई त्रुटिपूर्ण मुद्राओं को सहेजकर उन्होंने अपना खजाना तैयार किया है। उनके पास नोट प्रेस से बगैर नम्बर छपे चलन में आए नोटों के अलावा एक ही नम्बर तीन जगह मुद्रित होने वाले नोट भी हैं।

पेशे से दवा विक्रेता खंडेलवाल को करीब 10 साल पहले उनके हाथ में आए एक रुपए के मिसप्रिंट नोट ने ऐसे नोटों और सिक्कों को एकत्रित करने की प्रेरणा मिली। रफ्ता-रफ्ता उनका खजाना बढ़ता गया और कई लोगों की मदद से उन्हें आसानी से मिसप्रिंट नोट उनके संग्रह के लिए मिलने लगे। खंडेलवाल के मुताबिक कई बार ज्यादा कीमत चुकाकर तो कई बार एक्सचेंज आफर में लोगों से ऐसे नोट हासिल किए। हालांकि अधिकांश मिसप्रिंट नोट उन लोगों की मदद का नतीजा है, जिन्हें खंडेलवाल के इस शौक के बारे में जानकारी लगती थी। इनमें अधिकांश पान वाले और डेली कलेक्शन करने वाले साथियों का सहयोग ज्यादा रहा।

अपने पहले नोट के बारे में बताते हुए युवा दवा व्यापारी बृजमोहन कहते हैं कि उस एक के नोट पर महीनों के नाम देखकर हैरान रह गया, लेकिन फिर मन में आया कि ऐसे कई नोट होंगे जो नोट प्रेस की कड़ी चैकिंग से बचकर बाजार में आ गए हैं। बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को बाजार से बाहर कर देती है, इसलिए अर्थशा के इस गूढ़ वाक्य को ध्यान में रखकर गलत मुद्राओं को चलन से दूर रखने की कोशिश करता हूं।

खंडेलवाल के मुताबिक उनके पास नोट ही नहीं, टकसाल में गलत ढल गए सिक्के भी हैं। इनमें कटे सिक्कों के अलावा एक तरफ से बगैर आकृति छपे सिक्के शामिल हैं। इतना ही नहीं, संपत्ति की रजिस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले स्टॉम्प पेपर भी कुछ साल से उनके संग्रह में शामिल हो गए हैं।

कृष्ण ने भेदी थी मछली की आंख
भले ही भागवत कथा के मुताबिक द्रोपदी को ब्याहने के लिए अर्जुन ने पानी में अक्स देखकर मछली की आंख का निशाना साधा हो, लेकिन खंडेलवाल के संग्रह में डाक विभाग द्वारा जारी एक ऐसा टिकट भी है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को मछली की आंख का निशाना लगाते दिखाया गया है।

अच्छाई भी शामिल
ऐसा नहीं कि बृजमोहन खंडेलवाल के संग्रह में केवल गलतियों वाले सिक्के और नोट ही शामिल हों। उनके पास कई ऐसे सिक्के भी हैं जो भारत सरकार ने वक्त-वक्त पर विशेष मौकों पर निकाले हैं। इनमें आजादी की स्वर्ण जयंती पर जारी किए गए 100 रुपए के सिक्के के अलावा जार्ज पंचम के जमाने के सिक्के शामिल हैं।

लिम्का बुक में दर्ज है नाम
अपने इस अनूठे संग्रह के कारण खंडेलवाल के नाम रिकार्ड भी दर्ज है। 2002-03 में उनका नाम लिम्का बुक आफ रिकाड्र्स में शामिल किया जा चुका है। कुछ साल से गलत प्रिंट वाले नोट मिलना कम हो गए हैं। इसका कारण अब नोटों की गिनती मशीनों से होना है। पहले हाथों से नोटों की गिनती होती थी तो ऐसे नोट नजर में चढ़ ही जाते थे, लेकिन अब ऐसा कम हो गया है।

मिल गया साहिल मुझे

फ़रवरी 3, 2010

रेवती का ‘साहिल’ ऐसे बुजुर्गों का सहारा हैं, जिन्हें अपनों ने गम देकर घर से बाहर निकाल दिया।

कदम-कदम पर ऐसे मोड़ आते हैं जो जिंदगी की परिभाषा और मायने ही बदल देते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ रेवती शर्मा के साथ। हंसती-खेलती जीवन में वज्रपात हुआ। पति असमय ही काल के गाल में समा गए। कुछ बुजुर्र्गों के साथ नाइंसाफी होती देखी तो उन्हें सहारा देने के लिए वृद्धाश्रम ‘साहिल’ खोल लिया। यही रेवती का परिवार है। रेवती के लिए साहिल वृद्धाश्रम तक का सफर कोई आसान नहीं रहा। जयपुर में पली-बढ़ी और 1991 में शादी हो गई। कहती हैं, ‘पति जितेंद्र शर्मा जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में साइंटिस्ट थे। महज सात साल बाद ही हार्ट अटैक ने उन्हें छीन लिया। गम से उबरना मुश्किल था।

पति हमेशा रिटायरमेंट के बाद अजमेर में सैटल होने की बात कहते थे। इसलिए बेटे के साथ अजमेर चली आर्ईं।Ó वह बताती हैं, ‘अजमेर में रहते तीन साल पहले एक एक्सीडेंट ने कई दिन जेएलएन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। अपना न कोई देखरेख करने वाला था…न पूछने वाला। इसी बीच बगल के पलंग पर भर्ती वृद्ध महिला से मुलाकात हुई। समृद्ध परिवार से थी लेकिन कोई देखरेख करने वाला नहीं था। वृद्धा मानो कुछ संदेश लेकर आई थी। यहीं मुझे मेरा ‘साहिलÓ यानी किनारा और मेरी मंजिल मिल गई।

जीवन के किनारे पर खड़े बुजुर्र्गों की सेवा-सुश्रुषा मेरी जिंदगी का मकसद बन गया।Ó बड़ी बेकाकी से वह स्वीकार करती हैं, ‘बचपन में मैं दादा-दादी के ज्यादा करीब रहीं। मां का उनके प्रति व्यवहार को लेकर कभी-कभी खिन्नता होती थी।Ó बेटे का नाम पुष्पेंद्र है लकिन उसे भी वह साहिल कहकर पुकारती हैं।

अस्पताल से बाहर निकलते ही रेवती ने दो साल पहले किराए के मकान में साहिल वृद्धाश्रम की शुरुआत की। सबसे बड़ी समस्या धन की थी। रेवती कहती हैं ‘शहर में ऐसे आठ-दस लोग हैं जो मध्यमवर्ग से हैं लेकिन उनमें सेवाभाव का जज्बा है। ये लोग अपनी गृहस्थी के खर्र्चों से कटौती कर कुछ न कुछ वृद्धाश्रम को दान देते रहते हैं।Ó रेवती का परिवार धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। आज साहिल में 13 सदस्य हैं। इनमें ज्यादातर तो ऐसे परिवारों से हैं जहां किसी बात की कमी नहीं है। फिर भी उन्हें ठुकरा दिया। वह बताती हैं, शहर में ही कई ऐसे वृद्ध हैं जो परिवार की कलह से तंग आकर यहां आना चाहते हैं। जिसे कहीं ठोर नहीं मिल रही उसके लिए उनके साहिल के दर खुले हैं।

तालीम से काटो अंधेरा

फ़रवरी 3, 2010

बालिका-महिला शिक्षा के लिए प्रेरणा पुंज है शगुफ्ता
राजस्थान में ख्वाजा की नगरी अजमेर में अरावली पहाड़ी की तलहटी में बसी मुस्लिम बस्ती में अरसे से अशिक्षा का अंधेरा था। जहां महिलाओं का काम था घर और बच्चे संभालना। बालिकाओं को स्कूल भेजने की जरूरत ही नहीं समझी जाती थी। शोषण, घरेलू हिंसा की जड़ें उस अंधेरे में कहां तक पहुंच गई…किसी ने सोचा भी नहीं। करीब तीस साल पहले उस अंधेरे के बीच एक किरण फूटी, जो आज घनी आबादी में तालीम की रोशनी बांट रही है। उसका मानना है ‘तालीम ही वह शमशीर है जो जिंदगी की हर मुसीबत को काट सकती है।

हजारों लोगों की इस बस्ती में करीब-करीब हर महिला-बालिका उस किरण को शगुफ्ता मैडम के नाम से जानती हैं। शगुफ्ता खान, जिसका ख्वाब है, ‘हर बालिका पढ़े, हर महिला पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर हो। उनकी सेहत ठीक और भविष्य उज्ज्वल हो। वह मानती हैं, पवित्र कुरान हो या भारतीय संविधान दोनों में महिलाओ को बराबर के अधिकार मिले हुए हैं। जरूरत समझने की है। वह घर-घर जाकर महिलाओं को बताती हैं, ‘महिलाएं कुरान का अनुवाद पढें़, उन्हें खुद अहसास होगा कि वे मर्द से कमतर नहीं हैं।Ó

जाने कितनी फरीदा-सलमा…
नौ साल पहले दक्षिण भारतीय फरीदा की अजमेर में शादी हुई। उसकी माली हालत खराब थी। शगुफ्ता के संपर्क में आकर उसने आठवीं और फिर दसवीं कक्षा पास की। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा सहयोगिनी से लेकर आशा तक का सफर तय किया। आज अपनी जैसी अन्य महिलाओं के लिए आशा का ही काम कर रही है। यही कहानी सलमा की भी है। शगुफ्ता से पे्ररित होकर उसने ओपन स्कूल से दसवीं पास की। आज वह अनुदेशिका के तौर पर काम कर रही है। ऐसी ही जाने कितनी फरीदा और सलमा की जिंदगी में तालीम के सहारे शगुफ्ता ने उजाला किया है। शगुफ्ता खान ने बताया, ‘बचपन खादिम मोहल्ले में बीता। तब मुस्लिम महिलाओं का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं माना जाता था। जब मैं बहनों के साथ स्कूल जाती तो लोग बातें बनाते। कहते बच्चियों को पढ़ाने से क्या होगा? मां ने लोगों की नहीं अपने दिल की सुनी और हमें अच्छी तालीम दिलवाई।

दिन-ब-दिन फैला उजाला
गरीब नवाज महिला एवं बाल कल्याण समिति की सचिव शगुफ्ता खान ने अंदरकोट स्थित अपने घर के ऊपरी कमरे में दफ्तर बनाया। बस्ती से शुरू हुआ उनका सफर जयपुर, जोधपुर, भीलवाड़ा, टोंक तक पहुंच गया। नजदीकी गांव सोमलपुर को इस संस्था ने गोद ले रखा है। अब तक करीब डेढ़ हजार मुस्लिम महिला-बालिकाओं को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना इस संस्था की उपलब्धि है। भजनगंज, बिहारी गंज में बीड़ी मजदूर महिलाओं के उत्थान के लिए भी संस्था सक्रिय है। महिला स्वयं सहायता समूह बनवाकर महिलाओं को पैरों पर खड़ा करना, सरकारी योजनाओं से महिलाओं को लाभान्वित कराना, पल्स पोलियो अभियान से लेकर डॉट्स तक के कार्य में भागीदारी निभाना इस संस्था का कार्य है। शगुफ्ता का संदेश है, हर औरत में रजिया सुल्तान, रानी लक्ष्मी बाई व इंदिरा गांधी जैसी कुव्वत है। बस मुस्लिम महिलाएं अंधेरे से निकलकर उजाले को पहचानें।

न जुताई ना खाद, 40 साल से खेती

फ़रवरी 2, 2010

खेतों को जोते बिना, खाद का उपयोग किए बगैर क्या किसी फसल का बंपर उत्पादन संभव है? जी हां, इस असंभव को संभव बनाया होशंगाबाद के प्रयोगशील किसान राजू टाइट्स और उनकी पत्नी शालिनी टाइट्स ने। वे पिछले 40 वर्षों से ऋषि खेती (नेचर फर्मिंग) कर रहे हैं।

होशंगाबाद से

किसी काम को यदि लक्ष्य बनाकर मेहनत और सच्ची लगन से किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है। यही कर दिखाया है राजू टाइट्स ने। जापान के कृषि विशेषज्ञ मसेनेबू फुफुओका को अपना आदर्श मानने वाले टाइट्स  40 वर्षों से अपने 93 एकड़ के खेत में ऋषि पद्धति से खेती कर रहे हैं। इस काम में उनकी पत्नी शालिनी बखूबी साथ दे रही हैं। वह संभवत: ऋषि खेती करने वाली जिले की पहली महिला कृषक होंगी।

राजू ने बताया कि ऋषि खेती से न सिर्फ पर्यावरण में संतुलन बना रहता है, बल्कि कम लागत में किसान अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। इस पद्धति से न तो जमीन की जुताई करने की जरूरत है और ना रासायनिक/जैविक खादों की। इतना ही नहीं, गेहूं, धान, मक्का, मैथी, सहित अन्य फसलों को भी एक साथ लगाया जा सकता है। धान के बीजों को मिलाकर गेंदनुमा गोलियां गेहूं के बीच में फेंक दी जाती हैं। गेहूं की पैदावार काटने के साथ ही धान बढऩा शुरु हो जाती है।

नरवाई और पुआल भी फायदेमंद
टाइट्स ने बताया कि धान की कटाई के बाद अधिकतर किसान बची हुई नरवाई और पुआल को महत्वहीन समझकर जला देते हैं और खेतों को बार-बार जोतते हैं। इससे खेत कमजोर हो जाते हैं। पुआल आधारित खेती करने से जुताई की जरूरत नहीं रहती। खाद और दवा की भी जरूरत नहीं होती है। इस पद्धति से खेत स्वयं ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है।

दस साल से बांट रहे हैं ज्ञान का अमृत

फ़रवरी 2, 2010

बैतूल से

जिंदगी में काम से रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती। यह बात भले सुनने में अजीब लगे, लेकिन बैतूल जिले के कौसमी गांव में रहने वाले सत्तर बरस के अमृत लाल मालवीय को देखकर हर किसी को शायद यही अहसास होगा। उन्होंने बचपन से ही गुरु बनने का सपना संजोया था, जो पूरा नहीं हो पाया। अमृत लाल ने चालीस साल  सिंचाई विभाग की नौकरी में बिताए।

सन् 2001 में सेवानिवृत्ति के बाद अपना सपना पूरा करने के लिए उन्होंने कोसमी गांव के सरकारी स्कूल को चुना, जहां पिछले एक दशक से बिना पगार के बच्चों को विषयों की पढ़ाई के साथ ही देश-दुनिया की नवीनतम जानकारियां और मदद उपलब्ध कराने में जुटे हैं। देश की आजादी के वक्त आठ बरस के अमृत लाल को पढ़ाई के लिए अपने गांव कोसमी से बैतूल के टिकारी स्कूल तक पांच किलोमीटर का सफर पैदल तय करना पड़ता था।

बचपन से ही शिक्षा की अलख जगाने की तमन्ना रखने वाले अमृत लाल का 1957 में शिक्षक के लिए चयन भी हुआ, लेकिन उम्र कम (17 साल) होने के कारण उनको नौकरी नहीं मिल पाई। लिहाजा उनकी तमन्ना सपना बनकर रह गई। लेकिन सिंचाई विभाग की नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद अमृत लाल ने अपने ख्वाब को हकीकत में तब्दील कर दिया। जून 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद से ही उन्होंने गांव के प्राथमिक स्कूल में बच्चों को निशुल्क पढ़ाना शुरू किया था। सन् 2005 में यहीं पर मिडिल स्कूल खुला तो उन्होंने बड़ी क्लास में गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र पढ़ाना शुरू कर दिया। विषयों की पढ़ाई के साथ-साथ अमृत लाल अपने छात्रों को देश-दुनिया की खेल-राजनीति, विज्ञान, सामान्य ज्ञान से जुड़ी रोचक जानकारियां भी उपलब्ध कराते हैं।

पढ़ाई में कमजोर बच्चों पर खास मेहनत करना और गरीब छात्रों को हर तरह की मदद पहुंचाना उनकी आदत में शुमार है। उनका सिर्फ एक ही मकसद है और वह यह कि शिक्षा का स्तर सुधरे तथा गरीब बच्चों को भी को बेहतर शिक्षा मिले। यही वजह है कि स्कूल में पढऩे वाले छात्र-छात्राएं अमृत लाल का मान-सम्मान करते है। कोसमी गांव के स्कूली बच्चे ओबामा, अटल, सोनिया, सानिया जैसी शख्सियतों के साथ ही दुबई में बनी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, मुम्बई की ताज होटल के बारे बखूबी जानते हैं। इसके पीछे अमृत लाल की मेहनत ही है, जिनकी पढ़ाई का अंदाज काफी निराला है। वह रोजाना अखबार में आने वाली देश-दुनिया की ताजा-तरीन खबरों की कटिंग लाकर बच्चों को उनके बारे में समझाते हैं।

बस्ती कहे मास्साब

अमृत लाल ने भले चालीस साल सिंचाई विभाग में बिताए हैं, लेकिन बस्ती में उनकी पहचान शिक्षक के तौर पर बनी है। लोग उन्हे मास्साब के नाम से पुकारते हैं। गांव के मिडिल स्कूल में 6 से 8 तक तीन कक्षाओं को पढ़ाने के लिए सिर्फ तीन शिक्षक हैं। अमृत लाल के रहने से उनको काफी मदद मिलती है, जो दोपहर तीन से पांच बजे के बीच सभी कक्षाओं में पढ़ाई करवाते हैं। प्रभारी प्रधान पाठिका डॉ.सीमा भदौरिया के मुताबिक अमृत लाल मालवीय से बच्चों के साथ ही स्टाफ को भी मदद मिलती है। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण लोगों के लिए मिसाल की तरह है।

चौथी पास माहिर है बांध बनाने में

फ़रवरी 1, 2010

लक्ष्मणसिंह मुणिया चौथी पास है, लेकिन यह उसकी काबलियत का पैमाना नहीं है। उसे छोटे बांध- तालाब बनाने में महारत हासिल है। इसलिए वह मध्यप्रदेश में अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में काबिल ‘इंजीनियर’ के रूप में ख्यात है।

मध्यप्रदेश में झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखंड के छोटे से गांव कालीघाटी के 45 साल के लक्ष्मण मुणिया अब तक बिना किसी तकनीकी सहयोग के 12 से ज्यादा छोटे बांध और आधा दर्जन निस्तार तालाब बनवा चुके हैं। इस काम में उनके सहयोगी होते हैं स्वयंसेवी संस्था सम्पर्क के सहभागी, कुछ मजदूर और चंद गांव वाले। इन कामों के अलावा नाले बंधान और कंटूर ट्रेंच की संख्या तो गिनना भी उनके लिए मुश्किल हैं। तालाब की पडल भरने से लेकर हार्टिंग, केसिंग और वेस्टवेयर तक का काम कैसे किया जाता है, यह उन्हें अच्छे से पता है। उनका तकनीकी ज्ञान को देखकर पढ़े-लिखे भी ताज्जुब करते हैं।

मुणिया के काम की शुरुआत गांव में ही हुई। अकसर देखा करते थे कि तालाब टूट जाते और डेम में पानी नहीं टिकता था। लाखों सरकारी रुपए खर्च होते और फायदा किसानों को नहीं मिलता। शुुरुआत में वह वहां चला जाता, जहां निर्माण कार्य होते। देखते-देखते काम सीख गया और सम्पर्क के साथ मिलकर छोटे-मोटे काम किए। काम देखकर संस्था ने भी विश्वास दिखाया और बड़े काम करने का जिम्मा सौंप दिया। वह जामली नाले पर 2, रुपारेल-मनाशिया पनास नाले पर 1, काजबी में 1 छोटे बांध बना चुके हैं। खास तौर से पम्पावती नदी पर दो डेम बनाए हैं। इन सभी में हमेशा पानी मिलता है।

मुणिया बताते हैं कि तकनीकी आदमी नहीं होने से शुरुआती दौर में कई समस्याएं आई। कोई विश्वास ही नहीं करता था कि मैं यह काम कर सकता हूं। काम करने के पहले मैंने प्रदेश सहित राजस्थान, महाराष्ट्र, और गुजरात में वाटरशेड के काम देखे। इसके बाद अपने दिमाग से काम किया। इस बात को 15 साल से ज्यादा हो गए और आज भी तब के बनाए हुए तालाबों में एक भी लीकेज तक नहीं है। सबसे ज्यादा दुख तब हुआ जब ग्राम काजबी में सरकारी निस्तार तालाब बनाने के लिए उनके बनाए हुए तालाब को तोड़ दिया गया।

वह बताते हैं कि पिछले 22 साल से यह सेवा का कार्य कर रहे हैं। उनका यह काम करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि किसानों को वास्तविकता का पता चल सके और वे सरकार से कामों में हुई गलतियों का जवाब मांगे। उनका कहना है कि हरित क्रांति के बाद से किसान ज्यादा परेशान हुए। इसके बाद से खेती की लागत में बढ़ोतरी हुई और मुनाफा कम होता गया।

तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो

फ़रवरी 1, 2010

पर्ल का अनूठा अनाथ आश्रम

इरादों के आगे पहाड़ भी पिघल जाते हैं और चट्टानों से दुआओं की तेज रोशनी फूट पड़ती है। अमृतसर की पर्ल जसरा इसकी जीती-जागती मिसाल है। पर्ल जब सिर्फ 13 साल की थी, तभी उसके मां-बाप का आसरा उठ गया। वह अनाथ हो गई, पर उसकी हिम्मत नहीं टूटी। अब वह 24 साल की है और उसकी भूमिका अमृतसर में झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के 120 से अधिक अनाथ बच्चों की मां जैसी है। वह इन बच्चों के साथ समय गुजारती है। उनके साथ खेलती है, पढ़ाती है और उनके उज्जवल भविष्य के लिए अरदास करती है।
 
इस उजले पक्ष के साथ कुछ मार्मिक पीड़ा भी छिपी है, लेकिन पर्ल कहती हैं, ‘मेरे से बड़ा दर्द छोटी बच्ची कामिनी का है…। मैं निराश हो गई तो कामिनी का क्या होगा? कामिनी जब उसके सम्पर्क में आई, तब वह दो साल की दुबली-पतली बच्ची थी। अब कामिनी नौ साल की है। उसका शारीरिक विकास ठीक-ठाक हो रहा है। पर्ल के पांच कमरों का मकान चार से 15 साल के अनाथ बच्चों की पनाहगाह है। पर्ल को यह मकान अपनी ईसाई मां विरजिनिया जॉयसी और हिन्दू पिता कंवल किशोर जसरा से विरासत में मिला। मकान में उसके मां-बाप मिराण्डा मॉडर्न स्कूल चलाते थे, जो ज्यादा समय नहीं चल पाया। वह अब यहां अपने मामा पर्यावरणविद् एर्नेस्ट अल्बर्ट के सहयोग से इन बच्चों को जीवन के गुर एवं किताबी ज्ञान सिखाती है।

अपने पुराने दिनों की यादों में खोते हुए पर्ल कहती हैं, ‘मैंने दर्द को अपने भीतर ही समेट लिया था। मैं अन्य लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत बनना चाहती थी। पर्ल गूगल की प्रथम संस्था के लिए ग्राफिक डिजाइन का काम करती है। संस्था का फोकस ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने पर है। उसे संस्था से 14 हजार रुपए मिलते हैं, लेकिन यह राशि पर्ल के लम्बे-चौड़े कुनबे का गुजारा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पर्ल इन बच्चों के उत्थान के लिए लिए भामाशाहों की तलाश में है। वह भामाशाहों की मदद से 45 बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने में सफल रही है।

वह कहती है, ‘उम्मीद है, कुछ कॉरपोरेट हाउस भी हमारी मदद में आगे आएंगे। मैं तीन कमरे और बनाना चाहती हूँ, ताकि अधिक क्लास की व्यवस्था हो सके। अपने काम को सुव्यवस्थित करने के लिए वह ‘इनीश्एिटिव फॉर वाएबल एजुकेशनÓ के नाम से एनजीओ भी चला रही है। यह संस्था छह साल पहले शुरू हुई थी। इसे 2008 में पंजीकृत कराया गया। पर्ल ने अपने मिशन को कामयाब बनाने के लिए कुछ प्रयोग भी किए हैं। वह बताती है, ‘हम लोगों की मदद से जन्मदिन एवं उत्सव मनाते हैं। कुछ लोग इसमें साज-सज्जा और खाने की व्यवस्था करते हैं। पर्ल ने एक दर्जन कुत्ते भी पाल रखे हैं। इन्हें गलियों से पकड़ा गया।  इन्हें उसने जारा, पेची, कजरी, नन्हा, मैडम तुसाद और कालू जैसे नाम दे रखे हैं।

पर्ल अनाथ बच्चों के बीच वह खुद को अकेला महसूस नहीं करती। उसके लिए अनाथों की सेवा ही उसका मिशन सब कुछ है। वह कहती है, ‘मैंने अपनी शादी के बारे में अभी कुछ नहीं सोचा है। मेरे सपने इन बच्चों के साथ जुड़े हैं।Ó पर्ल जैसे बुलंद और नेक इरादे वालों के सपने कभी मरा नहीं करते। ऐसे सपने जो एक की आँखों से कई-कई आँखों में झिलमिलाते चले जाते हैं।
किसी ने कहा भी तो है..
तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो, तुमको अपने आप ही सहारा मिल जाएगा,
कश्ती कोई डूबती पहुँचा दो किनारे पे, तुमको अपने आप ही किनारा मिल जाएगा।

पीड़ा बन गई प्रेरणा

जनवरी 30, 2010

स्पास्टिक बच्चों को मुख्यधारा में लाने की सार्थक कोशिश

श्रीगंगानगर से

श्रीगंगानगर की विनिता आहूजा उन माताओं में से एक है, जो स्पास्टिक बच्चे (मस्तिष्क पक्षाघात से पीडि़त) की पीड़ा झेल रही है। वह इस पीड़ा को भुगत रही हैं कि बच्चे के कोख में पनपने से लेकर गोद में आने के सफर में जाने-अनजाने की असावधानी या दुर्घटना के क्या भयावह परिणाम हो सकते हैं। इसी पीड़ा से उन्होंने प्रेरणा ली कि कोई और मां उन जैसी हालत से नहीं गुजरे। उन्होंने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए प्रण किया कि वह स्पास्टिक बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास करेंगी।

बीस साल पहले अपने घर के एक कमरे से शुरू किया गया यह प्रयास आज जुबिन स्पास्टिक होम के रूप में प्रतिफल देने लगा है। इसमें स्पास्टिक बच्चे को नि:शुल्क फिजियोथैरेपी और स्पीच थैरेपी के माध्यम से स्वस्थ करने का प्रयास किया जाता है। विनिता के पति दर्शन आहूजा चिकित्सा के पेशे से जुड़े हुए है। शुरुआत में संसाधन जुटाने में तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई, लेकिन बच्चों को संभालने में खासा जोर आया। समर्पण की बदौलत हिम्मत नहीं हारी और उनसे नि:शुल्क सेवा पाने वाले बच्चों की संख्या तीन हजार को पार कर गई। अब तो उन्होंने ऐसे बच्चों को शिक्षित करने और रखने की व्यवस्था भी कर दी है।

कुछ लोग सहायता के लिए गुप्तदान करने लगे हैं। उसी से सब काम चल रहा है।- हर बच्चे में अपना बच्चा विनिता आहूजा कहती हंै कि स्पास्टिक बच्चे का जितना जल्दी थैरेपी से उपचार शुरू कर दिया जाता है, उसके शरीर के अंग उतने अधिक क्रियाशील होने की सम्भावना रहती है। अपने बेटे जुबिन के पैदा होने के तीन दिन बाद स्पास्टिक होने का पता लगने का जिक्र करते हुए वह बताती हैं कि पहले ऐसी सुविधा नहीं मिल पाई। अब जब भी कोई मां अपने स्पास्टिक बच्चे को गोद में लिए उनके पास पहुंचती है तो उसमें अपना बेटा जुबिन नजर आता है। वह उन्हें जुबिन (20) की मिसाल देती हैं, जो लगातार प्रयास से सब कुछ समझने और बोलने लगा है।

ड्रिल मशीन से आई क्रान्ति

जनवरी 30, 2010

बुआई के तीन काम एक साथ, धन्य हुए अन्नदाता

बारां से

बुआई के दौरान पहले खाद, फिर मिट्टी और बाद में बीज की उराई। किसान ही नहीं, कृषि विशेषज्ञ भी हैरान हो सकते हैं। यह संभव कर दिखाया बारां के कृषि यंत्र निर्माता हजारीलाल ओझा ने। उन्होंने ट्रैक्टर चलित ऐसी ‘सीड्स कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन बनाई, जिससे उन्नत खेती की वैज्ञानिक अवधारणा को मूर्त रूप मिला।

ओझा के इस आविष्कार को राष्ट्रीय नव प्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद ने सर्वोत्तम बीजाई मशीन घोषित किया। सन् 2002 में ओझा को तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी सम्मानित किया। अपने पैतृक कामकाज में कुछ नया करने का जोश और अनवरत प्रयास हजारी लाल को सफलता के इस मुकाम तक ले आया। यह बात और है कि आज भी किसानों के भलाई में खुद को झोंकने वाला हजारीलाल फटेहाल जिंदगी बसर कर रहा है।

टाइम गेप का सिद्धांत

ओझा को प्रेरित करने वाले कृषि विज्ञान केन्द्र अन्ता के मुख्य वैज्ञानिक आई.एन. गुप्ता ने बताया कि सीड्स कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन टाइम गेप के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें खाद और बीज के लिए बॉक्स में अलग-अलग व्यवस्था है। इसके आगे-पीछे एक ही लाइन में नौ-नौ ड्रिल हैं। आगे वाले ड्रिल से खेत में गहराई तक खाद पहुंचती है। बाद में स्वत: ही मिट्टी डलती है तथा पीछे की साइड में लगाए गए ड्रिल से कम गहराई पर बीज की उराई होती है। इस मशीन के उपयोग से बीस से पच्चीस प्रतिशत बीज और लगभग पचास प्रतिशत खाद की बचत होती है। खाद के नीचे होने से खेत की ऊपरी सतह में बीज के अंकुरण के बाद उसकी जड़ों को पनपने के अच्छे अवसर मिलते हैं। मशीन के जरिए उराई से खेत में खाद के अधिक उपयोग से जमने वाली कठोर परत से भी बचा जा सकता है, जो खेत में वर्षाकालीन जल रिसाव को रोकती है।

सम्मान मिला, संबल नहीं

पैंसठ वर्षीय हजारीलाल ओझा का बचपन लकड़ी के कृषि यंत्रों के निर्माण में परिजनों का सहयोग करते बीता। पारिवारिक आमदनी इतनी ही थी कि गुजर-बसर हो सके। जुलाई 1957 में बारां में आई बाढ़ ने परिवार की कमर तोड़ दी। ऐसे में पैतृक धंधे में सहयोग की जिम्मेदारी बढ़ी तो माध्यमिक स्तर के दौरान ही पढ़ाई छूट गई, लेकिन हौसला नहीं टूटा। शादी के बाद तीन बच्चे हुए। उनके पालन पोषण की जिम्मेदारी पैतृक व्यवसाय से जुड़े रहकर ही निभाई। यह विडम्बना ही है कि ओझा के कृषि यंत्रों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा तो गया, लेकिन आर्थिक संबल नहीं मिला। इससे उनका कारखाना आज भी उसी कवेलुपोश मकान में चल रहा है, जिसमें उनके पिता लकड़ी के कृषि यंत्र बनाया करते थे। सीड्स कम फर्टिलाइजर ड्रिल मशीन का पेटेन्ट लेने में कामयाब रहे ओझा अब भी नवाचार के लिए प्रतिबद्धता जताते हैं।

यूं उड़ान भरते हैं हौसले

जनवरी 30, 2010

कभी ताने सुनने वाला विकलांग आज है सैकड़ों नि:शक्तजनों का सहारा धन्नाराम पुरोहित

जालोर से

पैरों और एक आंख से नि:शक्त धन्नाराम पुरोहित के बारे में कभी गांव के लोग कहा करते थे कि यह बेचारा जि़ंदगी में क्या कर पाएगा, लेकिन आज उसी धन्नाराम ने सैकड़ों नि:शक्तजनों को धन्य कर रखा है। किसी भी विकलांग को तकलीफ न हो, वह आगे चलकर अपना सहारा खुद बने, इसके लिए धन्नाराम ने विकलांगों की सेवा को अपनी साधना बना लिया है। वह जालोर जिले में महावीर आवासीय मूक-बधिर विद्यालय के संचालक हैं तथा मूक-बधिर बच्चों और विकलांगों की सेवा में जुटे हुए हैं। इस विद्यालय में साठ मूक-बधिर बच्चे अध्ययनरत हैं।

यह जोधपुर संभाग का एकमात्र मूक-बधिर आवासीय विद्यालय है, जो सिर्फ धन्नाराम के जज्बे और समर्पण की वजह से चल रहा है। धन्नाराम कहते हैं- ‘ये सुन-बोल नहीं सकते, लेकिन मैं इनकी आंखें पढ़ता हूं। उनमें आगे बढ़कर आसमान चीरने का जज्बा है। यही मेरी हिम्मत है। धन्नाराम को अपना विकलंाग प्रमाण पत्र बनवाने के लिए पन्द्रह दिन अस्पताल के चक्कर काटने पड़े थे। तभी उन्होंने तय किया कि जि़दगी अपने जैसों की सेवा में ही बिताऊंगा।

धन्नाराम बताते हैं कि सात साल की उम्र में एक कंपाउंडर की लापरवाही की वजह से उनके पैर और एक आंख चली गई। घरवालों ने हरसंभव इलाज के साथ देवताओं के भी चक्कर काटे, लेकिन नतीजा शून्य रहा। पांचवीं तक गांव मेड़ा में पढ़े। मिडिल स्कूल पांच किलोमीटर दूर कूका गांव में थी, लेकिन पिता भैराराम की चाह थी कि वह आगे पढ़े। भैराजी तीन साल तक धन्नाराम को अपने कंधों पर बिठाकर स्कूल ले जाते और छुट्टी होने पर वापस लाते। तब धन्नाराम उन विकलांग बच्चों को देखकर चिंतित हुआ करते थे, जिनके घरवालों का जज्बा उनके पिता जैसा नहीं था। उन्होंने ठान लिया कि पढ़-लिखकर इनके लिए कुछ जरूर करेंगे। यही धुन आज उनकी सेवा का आधार है।

कहिए तो आसमां को जमीं पर उतार लाएं

मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।

मुहिम खुद के पैसों से

पहले पहल न तो सरकारी फंड था और ना नही समाजसेवी संस्थाओं का विश्वास। धन्नाराम ने खुद के पैसों से अभियान जारी रखा। सरकारी फंड तो आज भी नहीं है, लेकिन लोगों का इतना विश्वास हासिल कर लिया है कि किसी भी तरह के सहयोग के लिए कोई मना नहीं करता।