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जिओ तो सिर उठाकर…

फ़रवरी 13, 2010

हर कोई जिंदगी जीता है। लेकिन, एचआईवी पॉजिटिव दम्पती छत्रपाल और उनकी पत्नी रेखा का जीने का अदांज निराला है। इनके दिल में उमंगे है और लब पे अपने जैसे लोगों के लिए दुआएं। इन्हें देखकर तो यही सबक मिलता है कि जिंदगी खोने का नहीं, जीने का नाम है। वेलेन्टाइन डे पर प्रस्तुत है, राजस्थान में भरतपुर के एइस एचआईवी पॉजिटिव दम्पती के जिंदादिल हौसले से भरी दास्तां।

दस बरस से एचआईवी के साथ रह रहे छत्रपाल और उनकी पत्नी रेखा देवी आज मन की शक्ति और हंसकर जीने के दृढ़ संकल्प के चलते जिंदगी पर फतह करते नजर आते हैं। उनकी ग्यारह वर्षीय एक बेटी भी है,जो स्कूल में पढ़ रही है। कभी एचआईवी के अवसाद में डूबे छत्रपाल ने अपनी जिंदगी समाप्त करने की ठान ली थी, लेकिन आज वे अपनी पत्नी के संग सहायक काउंसलर बन एचआईवी पीडि़तों को जीने की राह दिखा रहे हैं। ऐसी राह जहां वे हौसले से जिएं और निसंकोच कह सकें, हां…हम पीएलएचए (पीपुल लिविंग विद एचआईवी एड्स) हैं!

38 वर्षीय छत्रपाल ग्रेजुएट हैं, पर आजीविका के लिए कभी ट्रक ड्राइविंग का कार्य करते थे और पूरे देश में घूमते थे। वे कहते हैं कि यात्रा के दौरान उन्होंने पेशेवर यौन संबंध बनाए। वर्ष 2004 की बात है। आगरा में जीजाजी की बीमार मां को रक्त की जरूरत पड़ी तो ब्लड टैस्ट करवाया और यह एचआईवी पॉजिटिव निकला। मुझे बताया गया कि मैं छह महीने से ज्यादा नहीं जिऊंगा। डिप्रेशन में मैंने पहली बार बेशुमार शराब पी और जब बोतल खाली हो गई तो फोड़कर अपने हाथ पर दे मारी। हाथ फट गया और खून का फव्वारा बह निकला। होश आया तो मैं अस्पताल में था और तब एहसास हुआ कि मैं मर नहीं सकता। हालांकि किसी दर्दीले सपने सा वह सच आज भी दहला जाता है, पर मेरे लिए प्रेरणा स्रोत भी यही घटना बनी। काउंसलर रामवीर ने मुझे जयपुर भेजा,जहां मैं आरएनपीप्लस (राजस्थान नेटवर्क पीपुल लिविंग विद एचआईवी) संपर्क में आया । एचआईवी संसार से बखूबी परिचित हुआ और जीने की कला सीखता चला गया।

एक दिसम्बर 2006 को विश्व एड्स दिवस पर रेखा से मुलाकात हुई। उसे देख मन में उससे ब्याह का खयाल आया। वह पति से संक्रमित होने के बाद विधवा हो गई। एक बच्ची की मां थी। 2008 में हम सामाजिक बहिष्कारों के चलते विवाह सूत्र में बंध गए। यह माना जाता है कि उत्तर भारत का यह पहला विवाह था, जो दो एचआईवी पीडि़तों ने किया था। रेखा सिंह आज छत्रपाल के संग बेहद खुश नजर आती हैं। बच्ची को एक पिता का भरपूर प्यार मिल रहा है, ससुराल में सब बेहद लाड़-प्यार और सम्मान से रखते हैं। बझेरा के ‘अपना घर’ में वे अपनी नर्सिंग सेवाएं दे रही हैं और दोनों आत्मनिर्भर हैं…भला और क्या चाहिए…?

रेखा बताती हैं कि अब तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि आम लोगों से वे किसी बात में बेमेल हैं। कभी जरूरत पड़ती है तो पूरा परिवार एआरटी (एंटी टिटो वायरल थैरेपी) भी लेता है। यह वैक्सीन स्वस्थ कर देती है और उम्र बढ़ाती है। शेष जीवन-मरण ऊपर वाले के हाथ में है, पर जब तक जिंदा हैं, जिंदादिली साथ है। अपने साथियों से गुजारिश है कि एचआईवी को एड्स न समझें। एचआईवी के साथ जिया जा सकता है और जिंदगी का भरपूर आनंद लिया जा सकता है।

हौसले का एक चिराग तुम जलाओ, उम्मीदों के हजार दीप, जिंदगी की अगवानी में जल उठेंगे…