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फीस में सिर्फ मुस्कुराहट

फ़रवरी 9, 2010

वेलेन्टाइन डे का बेसब्री से इंतजार कर रहे युवाओं के लिए जबलपुर के डॉ. जगत सिंह आहूजा और उनकी पत्नी आशा देवी की जोड़ी मिसाल है। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके दोनों का प्यार परोपकारी के राह पर मजबूत डोर में बंधा है। दोनों ही बिना किसी स्वार्थ के पीडि़त मानवता की सेवा में जुटे हुए हैं।

कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो उम्र आड़े नहीं आती। उम्र के 71 वसंत पार कर चुके डॉ. जगत सिंह आहूजा मरीजों के घर-घर जाकर उनका नि:शुल्क उपचार करते हैं। लोग उन्हें चलता-फिरता दवाखाना मानने लगे हैं। पीडि़त मानवता की सेवा को जीवन का लक्ष्य मान चुके डॉ. आहूजा एम.पी.एस.ई.बी में सहायक इंजीनियर रहे हैं।

सेवानिवृत्त होने के बाद पिछले दस साल से वह पीडि़तों का उपचार कर रहे हैं। लोग विश्वास से इलाज करा सकें, इसलिए वह अपने आयुर्वेद चिकित्सा, विटामिन थैरेपी, शिक्षा संबंधी प्रमाण पत्र साथ लेकर भी चलते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं सेवा भावना से कार्य कर रहा हूं। मेरा मरीज ठीक होकर मुस्कुरा दे, यही मेरी फीस है..।Ó परोपकारी के इस काम में उनकी पत्नी आशा देवी सहभागी रहती हैं।

साइकिल से सफर
इस उम्र में भी डॉ. आहूजा साइकिल चलाते हैं। वह सुबह दस बजे घर से साइकिल पर निकलते हैं। शहर में अलग-अलग स्थानों पर जाकर रोगियों को उपचार मुहैया कराते हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रतिदिन करीब 100 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। दमा, डायबिटीज, अस्थमा, पीलिया, वातरोग आदि की दवा देते हैं। वह तब तक मरीज के घर जाते रहते हैं, जब तक वह पूर्णत: स्वस्थ नहीं हो जाए।
एक वक्त भोजन
डॉ. आहूजा केवल एक वक्त भोजन करते हैं। उनके पास चिकित्सा शिक्षा से संबंधित सैकड़ों पुस्तकें हैं। सभी निरोगी रहें, यही उनकी कामना है। डॉ. आहूजा का मानना है कि तैराकी और साइकिलिंग सबसे अच्छा योग है। साइकिलिंग से बॉडी फिट रहती है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए भी साइकल बेहतर है। उन्होंनेे साइकिल के अलावा दूसरा कोई वाहन नहीं चलाया। उनकी तमन्ना साइकिल से भारत भ्रमण करने की है।