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पर्यावरण प्रेम में रंगे रंगा

फ़रवरी 6, 2010

राजस्थान के फलौदी जिले में जन्मे नरसिंह रंगा भले अल्प शिक्षित हों, लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी सोच और काम देखकर बड़े-बड़े पर्यावरणविद् अचंभित हो जाते हैं। आठवीं कक्षा पास करने के बाद रंगा मामा के साथ टिम्बर के व्यवसाय से जुड़ गए। लकड़ी की कटाई के लिए मध्यप्रदेश के जंगलों में घूमते रंगा के मन में एक दिन यह विचार आया कि हर आदमी जंगल काटने पर आमादा है। आखिर जंगल लगाने वाले भी तो होने चाहिए। जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर नर्मदा किनारे बसे ग्राम बासनियाकलां के पास उनकी थोड़ी जमीन थी। उन्होंने देखा कि हर साल नर्मदा की बाढ़ में उनकी जमीन कटती जा रही है। वह परेशान हो उठे। उन्होंने इस जमीन को बचाने की ठान ली।

सन् 1992 से उन्होंने नर्मदा के किनारे की जमीन पर बांस के पौधे रोपे। पौधे रोपने का नशा ऐसा चढ़ा कि वह नर्मदा किनारे जमीन खरीदते गए और पौधे रोपते गए। करीब दस साल में उन्होंने एक हजार एकड़ जमीन खरीदकर उस पर जंगल खड़ा कर दिया। इस समय इस जमीन पर लाखों की तादाद में बांस, खमेर, नीलगिरी के पेड़ खड़े हैं। यह सब उन्होंने बिना किसी शासकीय या गैर शासकीय मदद के किया है। जंगल से जमीन पर कटाव तो रुका ही, अब यह जंगल उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया भी बन गया है। वह इससे हर साल लाखों रुपए कमाते हैं। उनके जंगल को देखने प्रदेश और देश के कई पर्यावरणविद् और जंगल महकमे के अधिकारी आ चुके हैं। कई विदेशी पर्यावरणप्रेमी भी रंगा प्लांटेशन का भ्रमणकर उसकी तारीफ कर चुके हैं।

रंगा कहते हैं कि नर्मदा को बचाना है तो उनके दोनों किनारों पर सघन हरित पट्टी विकसित करनी होगी। इससे नर्मदा भी बचेगी और कटाव भी रुकेगा। खेती को यदि लाभ का धंधा बनाना है तो इससे बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है। रंगा ने जंगल की देखरेख रोकने अनोखा तरीका अपनाया है। नजदीकी ग्रामीणों को सब्जी और फसल उगाने के लिए वह जमीन फ्री उपलब्ध कराते हैं। इससे ग्रामीण जंगल की देखरेख करते हैं और चोरी जैसी घटनाएं नहीं होतीं।

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