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न डरूंगा न किसी को डरने दूंगा

फ़रवरी 4, 2010

एचआईवी पॉजीटिव राजपालसिंह शेखावत जगाते हैं बीमारी से लडऩे का जज्बा
अगर डर गया होता तो शायद जिंदा नहीं बचता और ना ही उन लोगों को हौसला दे पाता, जो मेरी तरह हैं। मेरा भरोसा देख कई लोगों में बीमारी से लडऩे की ताकत पैदा हो जाती है। भगवान ने मुझे न जाने कहां से यह हिम्मत दे डाली कि एचआईवी पॉजीटिव होने का पता चलने के बावजूद चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। खुद जीने की चाह और यही चाहत औरो में पैदा करने का संकल्प लिए एड्स पीडि़तों के लिए काम कर रहा हूं। हिम्मत भरे यह अल्फाज हैं 42 साल के राजपालसिंह शेखावत के। वह पिछले सात साल से मध्यप्रदेश के झाबुआ में रह रहे हैं। दो साल पहले उन्हें पता चला कि शरीर को ऐसी बीमारी लग गई, जिसका इलाज साइंसदान अब तक ढूंढ नहीं सके हैं।

वह साथी हैं जीवन ज्योति संस्था मेघनगर के परियोजना प्रबंधक जिमी निर्मल के। जिमी और वह मिलकर झाबुआ और आलीराजपुर में पॉजीटिव मरीजों की तलाश करते हैं, उन्हें एड्स के बारे में पूरी तरह से समझाइश देते हैं और इससे नहीं डरने की सलाह भी। उनके साथी जिमी बताते हैं कि बीते कई साल से इस फील्ड में काम कर रहा हूं, लेकिन राजपालजी के साथ होने से काम को गति मिली। जब कोई पीडि़त व्यक्ति खुद बीमारों तक जाकर उन्हें समझाता है तो उसका असर कुछ ज्यादा होता है।

शेखावत कहते हैं कि आगे जो होना है सो होकर रहेगा, लेकिन आज को जीने की चाहत ही सबसे बड़ी ताकत है। मुझमे वो ताकत है, जो अपने साथियों में बांटने की कोशिश करता हूं। जब मुझे पता चला कि एचआईवी पॉजीटिव हूं, तब जीने की सारी उम्मीद खत्म हो गई। एक महीने तक निराशा से जूझता रहा। जीवन ज्योति मेघनगर के लोगों ने मुझे समझाया की डरने की जरूरत नहीं है। उनकी बातों से कुछ करने को बल मिला और मैंने वॉलंटरी वर्क शुरू कर दिया। आठ महीने तक जीवन ज्योति हेल्थ सर्विस सोसायटी के साथ इस क्षेत्र में काम किया। फिर फील्ड में काम करने लगा। अब गांव-गांव जाकर मरीज ढूंढते हैं और उन्हें समझाते हैं।

जुलाई 2008 में एक नेटवर्क बनाया, ‘झाबुआ नेटवर्क ऑफ पीपल लीविंग विथ एचआईवी एड्सÓ। आज इस नेटवर्क में 120 पॉजीटिव सदस्य हैं। एक पूरा परिवार बन चुका है, जो हर महीने एक से दो बार मिलता है और अपने दु:ख-दर्द आपस में बांटता है। अब राजपालसिंह और भी पॉजीटिव मरीजों को इस मुहिम से जोडऩे की कोशिश में लगे हैं। मरीजों को आयवद्र्धक कार्यक्रमों से जोडऩे के लिए प्लान तैयार कर रहे हैं।

वह खुद को सामान्य व्यक्ति की तरह मानते हैं और ऐसा ही व्यवहार करते हैं। हालांकि कभी-कभार कुछ घटनाएं दिल दुखाने वाली भी सामने आती हैं। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि इंदौर में एक पुलिस वाले ने मोटर साइकिल पर लिफ्ट मांगी। वह सब इंस्पेक्टर था। रास्ते में बातचीत हुई तो उसने सवाल किया, क्या करते हो। मंने जवाब दिया एड्स पीडि़त हूं और पीडि़तों के लिए काम करता हूं। इतना सुनना था कि उसने गाड़ी रुकवाई और कुछ काम का बहाना कर वहां से भाग गया।

राजपालसिंह कहते हैं कि बीमारी को लेकर आम लोगों में जागरुकता की कमी है। यही कारण है कि पीडि़तों को अलग-थलग कर दिया जाता है। शहर और गांव सभी जगह यही हाल हैं। सरकारी अस्पतालों में भी पीडि़तों की केयर नहीं होती। सुविधाओं का अभाव बताकर उन्हें इंदौर जाने के लिए कह दिया जाता है। कुछ भी हो ,आखिरी सांस तक मैं यही कोशिश करूंगा कि लोग समझें और ऐसे लोगों को सामान्य जीवन जीने दें। न तो खुद डरूंगा और न ही अपने साथियों को डरने दूंगा।

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