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वांगचुक से सीखें, कैसी हो शिक्षा

फ़रवरी 7, 2010

लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है। यह सब कमाल किया लद्दाखी इडियट सोनम वांगचुक ने।

लेह से थोड़ी दूरी पर फे गांव में गैर-सरकारी संगठन सेकमॉल की इमारत है। यह कोई सामान्य इमारत नहीं है, बल्कि लद्दाख में शिक्षा के दिखाई दिए नए चेहरे की रचयिता है। यहीं से सोनम वांगचुक लद्दाख में शिक्षा को जनोन्मुखी बनाने की अपनी मुहिम चला रहे हैं। यह मुहिम आज सम्पूर्ण भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक आईना बन चुकी है, क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद हम अपनी शिक्षा पद्धति को जनता की जरूरत के अनुरूप नहीं बना पाए हैं। वांगचुक ने लद्दाख में मैकाले आधारित शिक्षा में बदलाव के लिए लम्बा संघर्ष किया और इसमें वह रोशनी का नायक बनकर उभरा।

वांगचुक के कामकाज को देखकर सहसा आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्सÓ के किरदार फुनसुक वांगडुग की याद आने लगती है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद शिक्षा को नया आयाम देने लद्दाख पहुंचता है। ऐसा एहसास होता है कि आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ के वांगडुग का किरदार सोनम वांगचुक की जिंदगी पर रचा गया। वांगचुक को आप और हम असली जिंदगी में ..लद्दाखी इडियट.. का नाम दे सकते हैं। लद्दाख में शिक्षा को लेकर सोचने का नजरिया बदला है। अब वहां के बच्चों को पता है कि स्कूल का पाठ्यक्रम क्या है, उन्हें कैसे अपना भविष्य संवारना है।

वांगचुक ने दुनिया की इस खूबसूरत वादियों में शिक्षा में बदलाव लाने की नींव 1988 में रखी। तब वह सिविल इंजीनियर बनकर लद्दाख लौटे थे। उस समय स्कूल की पढ़ाई आसान नहीं थी। आठवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम उर्दू था और उसके बाद नौंवी और दसवीं में पूरी शिक्षा अंग्रेजी में होती थी। वांगचुक खुद भी फेल हो गए। बाद में वह इंजीनियर बनने के लिए चले गए। जब वापस लौटे तो उन्हें वहां की शिक्षा के ढर्रे में कोई बदलाव दिखाई नहीं दिया।

बकौल वांगचुक, अगर असफलता का प्रतिशत 95 था तो इसका मतलब है कि पूरी प्रणाली में ही कुछ खामी है। हालांकि दिक्कतें इससे भी अधिक गहरी थी। सबसे बड़ी समस्या थी भाषा, प्रशिक्षित शिक्षक और ऐसे पाठ्यक्रम की, जो 11,000 फीट की ऊंचाई पर रहने वाले छात्रों का भविष्य संवार सके। केवल पांच फीसदी बच्चे ही दसवीं उत्तीर्ण कर पाते थे। बेहद चिन्ताजनक हालात थे। इसलिए वहां जरूरत थी बदलाव की, क्योंकि शिक्षा का मतलब पढऩा, लिखना और याद करना नहीं है। लद्दाखी शिक्षा का अर्थ है तेज दिमाग, कुशल हाथ और कोमल हृदय वाले होनहार छात्र।

वांगचुक ने लद्दाखी भाषा और संस्कृति के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने, स्कूल चलाने और प्रशिक्षित शिक्षक तैयार करने के लिए वहां के समुदाय को संगठित किया। शिक्षा में बदलाव के लिए त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई। इसके तहत गांवों में शिक्षा समितियां बनार्ई गई, शिक्षक प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराई गई और भाषा एवं संस्कृति ज्ञान पर ध्यान दिया। अभियान का बीडा ससपोल गांव के एक स्कूल से शुरू हुआ, जो श्रीनगर मार्ग पर पड़ता है। मेहनत रंग लाई और वहां की सरकार ने 1992 में प्राइमरी स्तर पर अंग्रेजी को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया। यह राय बनी कि अंग्रेजी की जानकारी के बगैर लद्दाखियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिल सकती। इससे लद्दाख के स्कूलों में सुधार का शैक्षिक मॉडल विकसित हो गया।

वांगचुक ने अपना अभियान सुचारू चलाने के लिए ‘एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (सेकमॉल) बनाई। इसके तहत 1994 में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन न्यू होप’ से लद्दाख के शिक्षा मॉडल में परिवर्तन की बयार बहने लगी। यह ऐसा अभियान था, जिसमें वांगचुक और उनकी साथियों ने सरकार और पूरे समुदाय का दिल जीता। वर्ष 1996 में हिल काउन्सिल ने वांगचुक के सहभागिता मॉडल को स्वीकार कर लिया। उन्होंने शिक्षकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और पाठ्यक्रम को बदल दिया। किताबों में शिक्षाप्रद बातों के अलावा लद्दाखी रीति-रिवाजों और पर्यावरण को लेकर जानकारी दी जाने लगी थी। इस कड़ी मेहनत का नतीजा कुछ दिनों में सामने आने लगा और 2002 में उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या पांच से बढ़कर 50 फीसदी हो गई।

फे में सेकमॉल का आवासीय परिसर शिक्षा में बदलाव की बेहतरीन मिसाल है। इसमें छात्रों के सम्पूर्ण विकास की दृष्टि से गतिविधियां चलती हैं। पढ़ाई का तरीका स्कूल पाठ्यक्रम से हटकर है। छात्रों को लद्दाखी संस्कृति और विरासत का ज्ञान कराने के साथ ही जीवन कौशल की सीख दी जाती है। यहां वरिष्ठ छात्र मामूली फीस देकर रह सकते हैं। शिक्षक बनने की चाहत रखने वाले लोगों को आर्थिक मदद दी जाती है। यह परिसर पूर्णतय: सौर ऊर्जा पर आधारित है। 16-24 पेनल के चार ऐरो बिजली उत्पादित करते हैं। इनसे कम्प्यूटर और टीवी चलते हैं। सामुदायिक रसोई में दो सोलर कूकर हैं। इनके लिए पेसिव सोलर डिजाइन का इस्तेमाल हुआ है। इसके अलावा कम कीमत का वाटर हीटर लगाया हुआ है। सेकमॉल की ओर से डिजाइन किए गए सौ लीटर के एक सोलर हीटर की कीमत 3500 रुपए है, जबकि इसी क्षमता का वाणिज्यिक हीटर 25000 रुपए में आता है।

वर्ष 2000 में वांगचुक ने खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘शेसन सोलर अर्थवक्र्सÓ बनाई। यह प्राइवेट, सरकारी, एनजीओ और सेना के लिए सोलर बिल्डिंग का निर्माण करती है। इसकी कमाई शैक्षिक सुधार और पर्यावरण जागरूकता पर खर्च होती है। शुरूआती दौर में वांगचुक के अभियान का खर्च संस्थापक सदस्यों के सहयोग से चलता था, लेकिन अब वह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका आधा खर्च सेकमॉल प्रकाशन कीकिताबों की बिक्री, शैक्षिक सहायता, ईको-टूरिज्म और सोलन बिल्डिंग निर्माण से निकलता है।

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